ग़ज़ल
नाराज़ है हलचल से ठहरा हुआ सन्नाटा
हर सम्त यहां है जो फैला हुआ सन्नाटा।
इक जंग सा ख़ुद से ही लड़ता हुआ सन्नाटा।
देखा है किसी ने क्या मरता हुआ सन्नाटा
सच बोलने वालों के अन्ज़ाम पे हँसता है
बस्ती में हर इक लब पे रक्खा हुआ सन्नाटा
तुम होते नहीं तब भी बस बात तुम्हारी ही
करता है मेरे घर में पसरा हुआ सन्नाटा
गम हो या ख़ुशी जो है आखों से टपक जाये
यूं अच्छा नहीं होता ठहरा हुआ सन्नाटा।
बेचैन सा करता है हरबार मुझे उसके
होठों पे अचानक से बढ़ता हुआ सन्नाटा
खण्डर में इमारत की आहट पे अचानक से
दिखता है परिंदे सा उड़ता हुआ सन्नाटा
हर राज पता है पर *ख़ामोश* ही रहता है
ऐसे ही बुरा हो के अच्छा हुआ सन्नाटा
दहशत जो श़हर तक थी अब मुल्क़ में छाई है
कतरे से यूं ही देखो दरिया हुआ सन्नाटा
राजीव कुमार
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