ग़ज़ल
मुझसे हर रोज गिला करती है
पर मेरे हक़ में दुआ करती है
इक अजीयत सी हवा करती है
जब चरागों से मिला करती है
मेरे ख़्वाबों के हसीं गार्डन में।
हर सुबह वाक किया करती है।
उसकी तस्वीर मेरे कमरे को।
उसकी ख़ुश्बू से भरा करती है
दोस्त कलतक थी मगर कल से ही
वो मेरी जान हुआ करती है
हुस्न जो काम नहीं कर पाती।
हां वही काम अदा करती है
भर चुके हैं जो उन्हीं जख्मों को
शाइरी रोज हरा करती है
राजीव कुमार
मुझसे हर रोज गिला करती है
पर मेरे हक़ में दुआ करती है
इक अजीयत सी हवा करती है
जब चरागों से मिला करती है
मेरे ख़्वाबों के हसीं गार्डन में।
हर सुबह वाक किया करती है।
उसकी तस्वीर मेरे कमरे को।
उसकी ख़ुश्बू से भरा करती है
दोस्त कलतक थी मगर कल से ही
वो मेरी जान हुआ करती है
हुस्न जो काम नहीं कर पाती।
हां वही काम अदा करती है
भर चुके हैं जो उन्हीं जख्मों को
शाइरी रोज हरा करती है
राजीव कुमार
No comments:
Post a Comment