ग़ज़ल (Happy Independence Day)
नफ़रत की तीरगी को मिटाने का वक़्त है।
उल्फ़त की रौशनी में नहाने का वक़्त है।
हर एक दुश्मनी को भुलाने का वक़्त है।
उजड़े हुए चमन को बसाने का वक़्त है।
घर से निकल के सड़कों पे आने का वक़्त है।
ज़िन्दा हैं अब भी हम ये बताने का वक़्त है।
ख़ामोशियों को शोर बनाने का वक़्त है।
जो सो रहे हैं उनको जगाने का वक़्त है।
वहशत की आग ज़िस्म जलाने लगी है पर।
किरदार अब भी अपना बचाने का वक़्त है।
इस बेहतरीन वक़्त में किस डर से हो छुपे।
यारों यही तो जान लुटाने का वक़्त है।
मौतों का सिलसिला भी अभी तक नहीं रुका।
यानी कि ये सवाल उठाने का वक़्त है।
भूखा गरीब रोता हुआ देख कर लगा।
चिड़ियों के साथ बाज लड़ाने का वक़्त है।
बाघों को जिस तरह से बचाने में हैं लगे।
वैसे ही अब ये देश बचाने का वक़्त है।
राजीव कुमार
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