ग़ज़ल
मैं घर में होते हुए घर का ध्यान भूल गया
बदन तो याद रहा और जान भूल गया
हमारी दुश्मनी बढ़ती गयी मगर इक दिन
वो अपना तीर मै अपना कमान भूल गया
यही निजाम यही तख़्त का सलीका है
लगान याद रहा पर किसान भूल गया।
अगर पता है किसी को तो मुझको बतलाये।
मैं अपने शह्र में अपना मकान भूल गया
गणित भुगोल कला और सारा लिटरेचर
तुम्हारे क्लास का हर नौजवान भूल गया
मुझे बचाओ कोई तो उसे भी समझाओ।
वो अपनी जान को ही सख्त जान भूल गया।
ये देख कर कि सभी क़ैद में हैं ख़ुश भी हैं।
उकाब ख़ौफ के मारे उड़ान भूल गया।
उसी को लोग बनाते हैं साहिबे मसनद
हमेशा दे के जो अपना बयान भूल गया।
राजीव कुमार
मैं घर में होते हुए घर का ध्यान भूल गया
बदन तो याद रहा और जान भूल गया
हमारी दुश्मनी बढ़ती गयी मगर इक दिन
वो अपना तीर मै अपना कमान भूल गया
यही निजाम यही तख़्त का सलीका है
लगान याद रहा पर किसान भूल गया।
अगर पता है किसी को तो मुझको बतलाये।
मैं अपने शह्र में अपना मकान भूल गया
गणित भुगोल कला और सारा लिटरेचर
तुम्हारे क्लास का हर नौजवान भूल गया
मुझे बचाओ कोई तो उसे भी समझाओ।
वो अपनी जान को ही सख्त जान भूल गया।
ये देख कर कि सभी क़ैद में हैं ख़ुश भी हैं।
उकाब ख़ौफ के मारे उड़ान भूल गया।
उसी को लोग बनाते हैं साहिबे मसनद
हमेशा दे के जो अपना बयान भूल गया।
राजीव कुमार
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