Tuesday, March 24, 2020

मैं घर में होते हुए घर का ध्यान भूल गया

ग़ज़ल

मैं घर में होते हुए घर का ध्यान भूल गया
बदन तो याद रहा और जान भूल गया

हमारी दुश्मनी बढ़ती गयी मगर इक दिन
वो अपना तीर मै अपना कमान भूल गया

यही निजाम यही तख़्त का सलीका है
लगान याद रहा पर किसान भूल गया।

अगर पता है किसी को तो मुझको बतलाये।
मैं अपने शह्र में अपना मकान भूल गया

गणित भुगोल कला और सारा लिटरेचर
तुम्हारे क्लास का हर नौजवान भूल गया

मुझे बचाओ कोई तो उसे भी समझाओ।
वो अपनी जान को ही सख्त जान भूल गया।

ये देख कर कि सभी क़ैद में हैं ख़ुश भी हैं।
उकाब ख़ौफ के मारे उड़ान भूल गया।

उसी को लोग बनाते हैं साहिबे मसनद
हमेशा दे के जो अपना बयान भूल गया।

राजीव कुमार

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