Thursday, May 28, 2020

भटकी हुई उदास कभी ज़िन्दगी न थी।

ग़ज़ल

भटकी   हुई   उदास  कभी  ज़िन्दगी  न थी।
इतनी  भी  बदहवास कभी  ज़िन्दगी  न थी।

पहले  भी  पुर सकून नहीं  थी ये सच है पर।
इस  दर्ज़ा  ग़म शनास  कभी ज़िन्दगी न थी।

रस्ते  पता  नहीं   है  मगर  हम  सफर  में हैं।
इस  तौर  बे   कयास  कभी  ज़िन्दगी न थी।

आईन,   इंन्तज़ाम,  शह्र,  मुल्क़ का निज़ाम।
हर  शय  से  यूं  निरास कभी ज़िन्दगी न थी।

तकलीफ़,  भूख,  प्यास, थकन मौत ले गयी।
यानी  हमारे  पास   कभी   ज़िन्दगी   न  थी।

पटरी   पे  थक  के सो गये मजदूर तब लगा।
सचमुच किसी की दास कभी ज़िन्दगी न थी।

कुछ ग़म तो कुछ खुशी से ये आधी तो थी भरी
खाली  पड़ी  गिलास  कभी  ज़िन्दगी न थी।

ये जान कर भी चलते रहे घर की ओर हम।
क़दमों  के  आस-पास कभी ज़िन्दगी न थी।

दुनिया  को  आज  देख कर ये सोचता हूं मैं।
इतनी  भी  बेलिबास  कभी  ज़िन्दगी  न थी।

राजीव कुमार

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