ग़ज़ल
भटकी हुई उदास कभी ज़िन्दगी न थी।
इतनी भी बदहवास कभी ज़िन्दगी न थी।
पहले भी पुर सकून नहीं थी ये सच है पर।
इस दर्ज़ा ग़म शनास कभी ज़िन्दगी न थी।
रस्ते पता नहीं है मगर हम सफर में हैं।
इस तौर बे कयास कभी ज़िन्दगी न थी।
आईन, इंन्तज़ाम, शह्र, मुल्क़ का निज़ाम।
हर शय से यूं निरास कभी ज़िन्दगी न थी।
तकलीफ़, भूख, प्यास, थकन मौत ले गयी।
यानी हमारे पास कभी ज़िन्दगी न थी।
पटरी पे थक के सो गये मजदूर तब लगा।
सचमुच किसी की दास कभी ज़िन्दगी न थी।
कुछ ग़म तो कुछ खुशी से ये आधी तो थी भरी
खाली पड़ी गिलास कभी ज़िन्दगी न थी।
ये जान कर भी चलते रहे घर की ओर हम।
क़दमों के आस-पास कभी ज़िन्दगी न थी।
दुनिया को आज देख कर ये सोचता हूं मैं।
इतनी भी बेलिबास कभी ज़िन्दगी न थी।
राजीव कुमार
भटकी हुई उदास कभी ज़िन्दगी न थी।
इतनी भी बदहवास कभी ज़िन्दगी न थी।
पहले भी पुर सकून नहीं थी ये सच है पर।
इस दर्ज़ा ग़म शनास कभी ज़िन्दगी न थी।
रस्ते पता नहीं है मगर हम सफर में हैं।
इस तौर बे कयास कभी ज़िन्दगी न थी।
आईन, इंन्तज़ाम, शह्र, मुल्क़ का निज़ाम।
हर शय से यूं निरास कभी ज़िन्दगी न थी।
तकलीफ़, भूख, प्यास, थकन मौत ले गयी।
यानी हमारे पास कभी ज़िन्दगी न थी।
पटरी पे थक के सो गये मजदूर तब लगा।
सचमुच किसी की दास कभी ज़िन्दगी न थी।
कुछ ग़म तो कुछ खुशी से ये आधी तो थी भरी
खाली पड़ी गिलास कभी ज़िन्दगी न थी।
ये जान कर भी चलते रहे घर की ओर हम।
क़दमों के आस-पास कभी ज़िन्दगी न थी।
दुनिया को आज देख कर ये सोचता हूं मैं।
इतनी भी बेलिबास कभी ज़िन्दगी न थी।
राजीव कुमार
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