भोजपुरी ग़जल
खेत बगइचा गइया गोरू गांव के मंदिर पिपरा ले।
सब कुछ पूछ रहल बा जैसे लौट के अइबा कहिया ले।
रोजो माई बोले सबसे फोन लगा दा बाबू के।
आंख से हमरे लउकत नइखे फोन के अब नम्बरवा ले।
शहर बजारे मेला तीरथ घुमा दिखा के दुनिया के।
जहवा पापा चल गइलन अब ना जा पाईब तहवा ले।
किरकेट खेले खातिर हमके रोज बोलावे सपना में।
आ जाये लन बिट्टू रीशू रिंकू लल्ला भोला ले।
काम से फुर्सत होते नईखीं और कमाई पूछअ मत।
चौबिस घंटा दउड़त-दउड़त फाट गईल बा जूता ले।
गांव में सगरे सोचत बाड़ें माल शहर में काटत बा।
लेकिन आलम ई बा भूखे सुत्तल बीया बुचिया ले।
हालत जस के तस ही बाटे खेती और किसानी के।
कर्ज में सब कुछ डूबल बाटे पैर से लेके कपरा ले।
गांव में अपनो काम मिलित ता केकरा के ई शौक बा ऊ।
भूखे प्यासे दउड़े धूपे बोम्बे से कलकत्ता ले।
राजीव कुमार
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