Wednesday, March 11, 2020

हर एक ज़ुल्म को बेजान करने वाला हूँ

ग़ज़ल

हर एक ज़ुल्म को बेजान करने वाला हूँ
मै अपने आप को चट्टान करने वाला हूँ।

हर एक ख़्वाब हकीकत में ढाल के इक दिन
हर एक शख़्स को हैरान करने वाला हूँ

फक़त बदन ही नहीं इक दफा तू कह दे तो
मैं अपनी जान तुझे दान करने वाला हूं।

मेरे खिलाफ़ मेरी ही अना है सो खुद से।
अब एक जंग का ऐलान करने वाला हूँ।

है वक्त अब भी अगर चाहो तो निकल जाओ।
मैं दिल को आज से जिन्दान करने वाला हूँ।

वफ़ा खूलूश दगा दर्द दीन और ईमाँ
तमाम मुश्किलें आसान करने वाला हूँ।

ख़ुशी है शह्र बसाने की पर ये गम़ भी है।
मैं अपने गांव को वीरान करने वाला हूँ।

राजीव कुमार

जिन्दान- क़ैद

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