Sunday, April 26, 2020

शाइर के ख़्यालात अक़ीदत की तरह देख

ग़ज़ल

शाइर के ख़्यालात  अक़ीदत की तरह देख
गम़गीन नज़ारों को मसर्रत की तरह देख
(मसर्रत= ख़ुशी)

फूलों को कभी यार की सूरत की तरह देख
यानी की महब्बत को महब्बत की तरह देख

जंगल को क़बा नदियों पहाङों को अलंकार
धरती को अगर देख तो औरत की तरह देख
(क़बा- वस्त्र) (अलंकार-गहने)

बे रंग फज़ाओं पे उदासी की घटा को
इस शह्र में फैली हुई ख़ल्वत की तरह देख
ख़ल्वत- अकेलापन

हर एक मुसीबत से निकल जायेंगे हम लोग
पहले तू मुसीबत को मुसीबत की तरह देख

बेटों को तो सदियों से सभी देख रहे हैं
बेटी को भी तू घर की रऊनत की तरह देख।
(रऊनत- गर्व,अभिमान)

शामिल है बुजुर्गों का जहां ख़ून पसीना
उस गांव की मिट्टी को भी दौलत की तरह देख

दुनिया की हर इक चीज़ में होती है महब्बत
ये ख्वाब भी इक रोज़ हकीकत की तरह देख।

राजीव कुमार

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