Wednesday, March 11, 2020

इक बात कहूं ये जो ईमान सरीखा था। दिल पर ये किसी भारी चट्टान सरीखा था।

ग़ज़ल

इक  बात   कहूं  ये  जो  ईमान सरीखा था।
दिल पर ये किसी भारी चट्टान सरीखा था।

आजाद समझते थे जिस शह्र में अपने को।
वो शह्र  की  सूरत  में  जिन्दान सरीखा था।

उस शख़्स की मिट्टी भी मिट्टी में मिली आख़िर।
खुद अपनी नज़र में जो भगवान सरीखा था।

इस भागती दुनिया में देखा जो ठहर कर तो।
अपने सा  लगा  वो जो अन्जान सरीखा था।

नादान  है  ये  दुनिया  कहती है उसे अच्छा।
जो  शख़्स  हकीक़त  में  शैतान सरीखा था।

नफ़रत ने बिगाड़ी है इस मुल्क़ की सूरत को।
वरना तो  वतन अपना  गुलदान सरीखा था।

हर  बार  के  जैसे   ही  वो  मेरी  तबाही पर।
हैरां   तो   नहीं   था  पर  हैरान  सरीखा था।

हिन्दु  था  मुसलमां  था  मालूम  नहीं  लेकिन।
जो  ख़त्म  हुआ  था  वो  इन्सान सरीखा था।

राजीव कुमार

जिन्दान - जेल

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