ग़ज़ल
दुनिया के झमेलों में पड़ा चीख रहा है
इन्सान अंधेरों में पड़ा चीख रहा है
उस आदमी के जख़्म भी अब चीख रहे हैं
जो आप के कदमों में पड़ा चीख रहा है।
इस शह्र में सब चुप हैं मगर दोस्तों ये दिल
हम जैसों के सीनों में पड़ा चीख रहा है
सड़कों पे गरीबी का हुजूम इस लिये है की
इक आदमी महलों में पड़ा चीख रहा है
जिस ज़ुर्म पे पछता रहे हैं एक सदी से।
वो वाकिया लम्हों में पड़ा चीख रहा है
उस शोर में हम सो ही नहीं पाते हैं शब भर
इक ख़्वाब जो आंखों में पड़ा चीख रहा है
अखबार में सब झूठ यहां बेच रहे हैं
जो सच है वो खबरों में पड़ा चीख रहा है।
जब बोस करे शोर तो दफ़्तर में लगे यूं
इक कोयला हीरों में पड़ा चीख रहा है
लाचार हो के आप के हर एक सितम से
इक अश्क़ भी आंखों में पड़ा चीख रहा है
दीदार की उम्मीद में कमरे का कलेण्डर।
दीवार की बाहों में पड़ा चीख रहा है।
उल्फ़त की कहानी का सिला एक सदी से
राजीव की ग़ज़लों में पड़ा चीख रहा है
राजीव कुमार
दुनिया के झमेलों में पड़ा चीख रहा है
इन्सान अंधेरों में पड़ा चीख रहा है
उस आदमी के जख़्म भी अब चीख रहे हैं
जो आप के कदमों में पड़ा चीख रहा है।
इस शह्र में सब चुप हैं मगर दोस्तों ये दिल
हम जैसों के सीनों में पड़ा चीख रहा है
सड़कों पे गरीबी का हुजूम इस लिये है की
इक आदमी महलों में पड़ा चीख रहा है
जिस ज़ुर्म पे पछता रहे हैं एक सदी से।
वो वाकिया लम्हों में पड़ा चीख रहा है
उस शोर में हम सो ही नहीं पाते हैं शब भर
इक ख़्वाब जो आंखों में पड़ा चीख रहा है
अखबार में सब झूठ यहां बेच रहे हैं
जो सच है वो खबरों में पड़ा चीख रहा है।
जब बोस करे शोर तो दफ़्तर में लगे यूं
इक कोयला हीरों में पड़ा चीख रहा है
लाचार हो के आप के हर एक सितम से
इक अश्क़ भी आंखों में पड़ा चीख रहा है
दीदार की उम्मीद में कमरे का कलेण्डर।
दीवार की बाहों में पड़ा चीख रहा है।
उल्फ़त की कहानी का सिला एक सदी से
राजीव की ग़ज़लों में पड़ा चीख रहा है
राजीव कुमार
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