ग़ज़ल
जिन्दान हैं वो घर जहां आबाद हैं क़ैदी।
जंजीर की लम्बाई तक आज़ाद हैं क़ैदी।
तकलीफ में वो लोग हैं जो क़ैद नहीं हैं।
जो क़ैद में है आज वही शाद हैं क़ैदी।
जिस वक़्त परिन्दों की सदा पहुंची ख़ुदा तक
उस वक्त से ही शह्र के सय्याद हैं क़ैदी।
अल्लाह के इश्फ़ाक़ की ईजाद हैं इन्सां।
इन्सान के अस्क़ाम के ईजाद हैं क़ैदी।
इश्फ़ाक़- दया, उदारता
अस्क़ाम-नीचता, दुष्टता
इक दौर था जब जेल का डर जेल का डर था
इस दौर में तो जेल के उस्ताद हैं क़ैदी।
दुनिया का ख़ुदा ख़ुद को समझने जो लगे थे
इस वक़्त वो इन्सान की औलाद हैं क़ैदी।
राजीव कुमार
जिन्दान हैं वो घर जहां आबाद हैं क़ैदी।
जंजीर की लम्बाई तक आज़ाद हैं क़ैदी।
तकलीफ में वो लोग हैं जो क़ैद नहीं हैं।
जो क़ैद में है आज वही शाद हैं क़ैदी।
जिस वक़्त परिन्दों की सदा पहुंची ख़ुदा तक
उस वक्त से ही शह्र के सय्याद हैं क़ैदी।
अल्लाह के इश्फ़ाक़ की ईजाद हैं इन्सां।
इन्सान के अस्क़ाम के ईजाद हैं क़ैदी।
इश्फ़ाक़- दया, उदारता
अस्क़ाम-नीचता, दुष्टता
इक दौर था जब जेल का डर जेल का डर था
इस दौर में तो जेल के उस्ताद हैं क़ैदी।
दुनिया का ख़ुदा ख़ुद को समझने जो लगे थे
इस वक़्त वो इन्सान की औलाद हैं क़ैदी।
राजीव कुमार
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