ग़ज़ल
रहनुमाओं को अब जगाना है।
इस लिये इन्कलाब लाना है।
जिनका मकसद हमें मिटाना है।
सामने उनके सर उठाना है।
उनकी ताकत को आजमाना है।
जुल्म सह कर भी मुस्कुराना है।
देखना है कि बेकुसूरों पर।
कब तलक उसको ज़ुल्म ढाना है।
तख्त और ताज छिन भी सकतें हैं
ये शहंशाह को बताना है
जो कफन सर से बांध कर निकले।
उनको क्या मौत से डराना है।
मांगने से कभी नहीं मिलता।
हक हमें छीन कर ही पाना है।
उसको लगता है उनसे जीतेगा।
जिनको पत्थर पे गुल खिलाना है।
इस जमाने से ये किसान नहीं।
इन किसानों से ये जमाना है।
राजीव कुमार
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