ग़ज़ल
बेहतर को बेहतरीन बनाने की एक ज़िद
आदम को है मशीन बनाने की एक ज़िद
शाइर बने तो बनते ही इस दिल में बन गयी
हर वाक़िए को सीन बनाने की एक ज़िद
नफ़रत कहीं न हमको मिटा दे सो इश्क़ पर
पैदा करो यक़ीन बनाने की एक ज़िद
हर बार तू ही साँप बनेगा तो मुझे भी
है यार आस्तीन बनाने की एक ज़िद
इक नौजवां का नौकरी पाना इस अहद में
सागर पे है ज़मीन बनाने की एक ज़िद
चैनल हमारे मुल्क़ के पाले हुए हैं अब
सबको तमाशबीन बनाने की एक ज़िद
शाइर गुलाम रिन्द सभी बन चुके हैं हम
ख़ुद को है अब मतीन बनाने की एक ज़िद
इक रोज मेरे बाद कहोगे जहान को
मुझमें ही थी ज़हीन बनाने की एक ज़िद
राजीव कुमार
मतीन - जिसमें मतानत हो, गंभीर, धीर, शांतचित्त, संजीदः ।
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