ग़ज़ल
होली दिवाली ईद की नूरी तेरे बगैर
हर इक ख़ुशी है आधी अधूरी तेरे बगैर
गुलशन नदी पहाङ ये फूलों पे तितलियाँ
कुछ भी नहीं है इतना जरूरी तेरे बगैर
तेरे बगैर कैसे मुकम्मल हो जिन्दगी
जब इक गजल न हो सकी पूरी तेरे बगैर
बस दो कदम की दूरी है कालिज से घर मगर।
लगती है साठ मील की दूरी तेरे बगैर
है खुदकुशी गुनाह तो जिन्दा हूं मैं मगर
है जिन्दगी भी गैर जरूरी तेरे बगैर
बे रंग हो गया है तेरे बाद भीमताल
बेनूर हो गयी है मसूरी तेरे बगैर
राजीव कुमार
होली दिवाली ईद की नूरी तेरे बगैर
हर इक ख़ुशी है आधी अधूरी तेरे बगैर
गुलशन नदी पहाङ ये फूलों पे तितलियाँ
कुछ भी नहीं है इतना जरूरी तेरे बगैर
तेरे बगैर कैसे मुकम्मल हो जिन्दगी
जब इक गजल न हो सकी पूरी तेरे बगैर
बस दो कदम की दूरी है कालिज से घर मगर।
लगती है साठ मील की दूरी तेरे बगैर
है खुदकुशी गुनाह तो जिन्दा हूं मैं मगर
है जिन्दगी भी गैर जरूरी तेरे बगैर
बे रंग हो गया है तेरे बाद भीमताल
बेनूर हो गयी है मसूरी तेरे बगैर
राजीव कुमार
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