Monday, October 5, 2020

कई ख्वाबों की इक तामीर है ये

 ग़ज़ल


कई ख्वाबों की इक तामीर है ये

हमारे मुल्क़  की तस्वीर है ये


तरक्की के लिये फिरका परस्ती

 समझिये पांव की जंजीर है ये


मेरी आदत है जो सच बोलने की

मेरी गर्दन पे इक शमशीर है ये


कुआँ तालाब पीपल नीम तुलसी

हमारे गांव की तस्वीर है ये


जेहालत मुफ़लिसी बेरोजगारी 

हमारी आपकी तकदीर है ये


अजीब इन्सान है दुश्मन हमारा 

हमारे ग़म से भी दिलगीर है ये

(दिलगीर-उदास)


तुम्हारा हुस्न सर से पा सरापा 

मेरी जां सच कहूं कश्मीर है ये 


वतन सबका है पर ये मत समझना

किसी के बाप की जागीर है ये


राजीव कुमार

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