ग़ज़ल
कई ख्वाबों की इक तामीर है ये
हमारे मुल्क़ की तस्वीर है ये
तरक्की के लिये फिरका परस्ती
समझिये पांव की जंजीर है ये
मेरी आदत है जो सच बोलने की
मेरी गर्दन पे इक शमशीर है ये
कुआँ तालाब पीपल नीम तुलसी
हमारे गांव की तस्वीर है ये
जेहालत मुफ़लिसी बेरोजगारी
हमारी आपकी तकदीर है ये
अजीब इन्सान है दुश्मन हमारा
हमारे ग़म से भी दिलगीर है ये
(दिलगीर-उदास)
तुम्हारा हुस्न सर से पा सरापा
मेरी जां सच कहूं कश्मीर है ये
वतन सबका है पर ये मत समझना
किसी के बाप की जागीर है ये
राजीव कुमार
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