ग़ज़ल
सिर्फ़ सेहत नहीं बदन भी गया।
जो कमाया था सारा धन भी गया।
एक उस गुल बदन के जाते ही।
लहलहाता हुआ चमन भी गया।
यूं भी होता है लोस उल्फ़त में।
क़ैच छूटा और एक रन भी गया।
पार करते ही लक्ष्मण रेखा।
यूं समझिये कि फिर हिरन भी गया।
पहले तो पांव से ज़मीन गयी।
और उड़ते हुए गगन भी गया।
घर से निकले तो ये समझ लेना।
आप तो आप ये वतन भी गया।
राजीव कुमार
सिर्फ़ सेहत नहीं बदन भी गया।
जो कमाया था सारा धन भी गया।
एक उस गुल बदन के जाते ही।
लहलहाता हुआ चमन भी गया।
यूं भी होता है लोस उल्फ़त में।
क़ैच छूटा और एक रन भी गया।
पार करते ही लक्ष्मण रेखा।
यूं समझिये कि फिर हिरन भी गया।
पहले तो पांव से ज़मीन गयी।
और उड़ते हुए गगन भी गया।
घर से निकले तो ये समझ लेना।
आप तो आप ये वतन भी गया।
राजीव कुमार
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