Saturday, December 5, 2015

हसांते हैं रूलाते हैं सताते हैं मनाते हैं

फिलबदीह काव्योदय पर कही गजल
हसांते हैं रूलाते हैं सताते हैं मनाते हैं
हम अपनी जिन्दगी को हर घङी यूं आजमाते हैं
जबां है तल्ख जिनकी उनसे तो खतरा नहीं लेकिन ।
बहुत सीरी जबां वाले ही अक्सर मार जाते हैं
मुझे मिट्टी में जब चाहो मिला देना मगर सुन लो
फकीरों के मजारों पर ही सब चादर चढाते हे
कई दिन तक में अपने आप से कुछ कह नहीं पाता।
मगर कुछ दिन भी मुझसे फेर कर मुंह लौट जाते हे
नयी दुनिया नयी नस्लें नयी तहजीब है लेकिन ।
न जाने दोस्तों को लोग क्यूं दुश्मन बुलाते हैं
खिलाफत में हमारे इससे ज्यादा क्या कहेंगे वो।
जो हमको भी किसी दर्जे का अब शायर बताते हैं
राजीव कुमार

दश्त दरीया और सहरा की रवानी लिख गया

फिलबदीह गजल हाजिर
दश्त दरीया और सहरा की रवानी लिख गया
आसमां पर मैं जमीं की हर कहानी लिख गया।
गर कभी गलती से भी मैं हक बयानी लिख गया।
लोग कहने लग गये मैं बद जुबानी लिख गया
दौर ए नौ में धोती कुर्ता शेरवानी लिख गया।
मैं मेरी तहजीब की हर इक निशानी लिख गया
इश्क उल्फत जुल्फ शोखी और जवानी लिख गया ।
शायरी के नाम पर सब लंतरानी लिख गया
जब तस्वुर में तुम्हारा हुस्न आया जानेजां।
यक ब यक मैं गुल दुपहरी रात रानी लिख गया
हर्फ जिन्दा हो गये तेरी गजल के ए खुदा
तू दरख्तो पर परिन्दों की कहानी लिख गया ।
आज वो ही ले रहा हे लुत्फ अच्छे दिन के सब।
जो यहां वादों को जुमलों की जबानी लिख गया ।
राजीव कुमार
लंतरानी --- डींगे मारना

उठाओ लुत्फ यारों बेखुदी का ।

काफी दिनों बाद एक कोशिश
उठाओ लुत्फ यारों बेखुदी का ।
भरोसा कुछ नहीं है जिन्दगी का।
चरागे दिल जला के रख दिया है।
अंधेरा क्या करेगा रौशनी का।
किसी के इक इशारे पर तबाही ।
किसी से कुछ नहीं बिगङा किसी का।
नहीं टूटेगा तुमसे दिल हमारा।
तजुर्बा है हमें भी आशिकी का।
तुम अपने हुस्न की दौलत संभालो।
मैं कायल हुं किसी की सादगी का।
मुसलसल दास्तान ए गम सुना कर।
मैं कातिल बन गया था शायरी का ।
राजीव कुमार

सिवा तेरे जहां में दूसरा हो ही नहीं सकता

सिवा तेरे जहां में दूसरा हो ही नहीं सकता
कोई इन्सां कभी मेरा खुदा हो ही नहीं सकता।
मुहब्बत मौत मंजिल क्या तुझे मैं खो के पाउंगा।
किसी भी हाल में ये फैसला हो ही नहीं सकता।
ये दुनियां छोङ जाउंगा यकीनन एक दिन मैं भी।
मगर ता जिन्दगी तुझसे जुदा हो ही नहीं सकता ।
राजीव कुमार

तङप कर रोज खुद से पूछता हुं ।

गजल पेश ए खिदमत तवज्जो तलब
🙏🏻🙏🏻🙏🏻
तङप कर रोज खुद से पूछता हुं ।
मैं तन्हा क्युं अभी तक जी रहा हूं।
जूदा होकर ही मैं भी जान पाया
तुम्हे ही ख्वाब में क्युं ढूंढता हुं ।
तुम्हारा नाम ही नीकळे जुबां से
मैं जब भी नींद में कुछ बोलता हुं ।
मुकम्मल हो नहीं पाया कभी भी।
कोई पेंचीदा किस्सा बन गया हुं
जिसे जो भी समझना है वो समझे।
मैं दिल की बात सारी कह चुका हूँ।
राजीव कुमार

तू कभी मुझसे भी मिली हे क्या

तू कभी मुझसे भी मिली है क्या
 तेरा ही नाम ज़िन्दगी है क्या

मेरी क़िस्मत में हर ख़ुशी है क्या ।
तू मेरे वास्ते बनी है क्या।

तू मिरे जिस्मो जान में जानां।
रूह बन कर उतर गयी है क्या।

ये जो करते हैं इश्क इन सब से 
सारी दुनिया से दुश्मनी है क्या

दिन बिछङने का था मुकर्रर जो
यार वो दिन भी आज ही है क्या

ऐसा लगता है थक गया हुं मैं
ये घङी आखिरी घङी है क्या

सब उजालों से डरने वाले हैं
अब अंधेरों की रहबरी है क्या

राजीव कुमार

मेरे गम नहीं मुझको तन्हा करेंगे

फिलबदीह
मेरे गम नहीं मुझको तन्हा करेंगे
ये हर हाल में साथ मेरे रहेंगे
जूदा हो गये आप ये जान कर भी
बिना आप के हम नहीं जी सकेंगे
हवा की खिलाफत हैं आज सारे।
दिये अम्न के ऐसे कैसे जलेंगे
वफा या जफा तुम जो चाहो वो कर लो
मुहब्बत मेरी जां तुम्ही से करेगे।
कोई न कोई गम हर इक शक्स को है।
कहां तक हम हर हाल में खुश रहेंगे
राजीव कुमार

नहीं पूछिये राज मेरी खुशी का

नहीं पूछिये राज मेरी खुशी का
मजा लीजिये आप भी तिस्नगी का
ये खानाबदोशी ये रोटी कमाई ।
बहुत बेरहम खेल है जिन्दगी का ।
किसानों की खातिर ये बरिस का मौसम।
सबब बन न जाये कहीं खुदकुशी का
जरा फांसले से मिलो आप सबसे।
भरोसा किसी को नहीं हे किसी का।
मुहब्बत मुहब्बत जो चिल्ला रहे हैं।
उन्हें कुछ पता ही नहीं आशिकी का।
सूकुं दिल को मिलता नहीं है कहीं भी
हुआ जब से है रोग दीवानगी का।
राजीव कुमार

Wednesday, September 16, 2015

चांद सितारों वाला मंजर धोखा है

चांद सितारों वाला मंजर धोखा है
इश्क तो बाबू एक भयंकर धोखा है
जुल्फ अदायें हुस्न नजाकत तो हैं ही।
आंखों का वो झील समंदर धोखा है
दिलकश चहरे महंगे कपङे वालों के
बेटा देखो जिस्म के अंदर धोखा है।
प्याज अकङ के आज कह रहा है यारों
गाजर मूली और चुकंदर धोखा है।
उम्र के आखिरी हिस्से में मालूम हुआ।
जीवन भी तो एक निरंतर धोखा है।
राजीव कुमार

गजलों का दीवान बना कर रक्खुंगा


गजलों का दीवान बना कर रक्खुंगा
ऐसा हिन्दुस्तान बना कर रक्खुंगा ।
रस्म रवायत दुनियादारी इश्क वफा
सब मुश्किल आसान बना कर रक्खुंगा।
सहरा दरिया सागर अम्बर जाने दो।
सीने में तूफान बना कर रक्खूंगा।
कारों में सब यार मेरे अब चलते हैं
मैं कब तक ईमान बना कर रक्खुंगा ।
जीने की खातिर इस दुनियां में देखो।
थोङा तो सामान बना कर रक्खुंगा ।
धर्म इबादत और तिजारत तुम रक्खो।
मैं खुद को इन्सान बना कर रक्खुंगा ।
मिट्टी में मिल कर भी इक दिन मैं यारों ।
मिट्टी की पहचान बना कर रक्खुंगा ।
राजीव कुमार

जो खुद के वास्ते रहबर बनुंगा।

जो खुद के वास्ते रहबर बनुंगा।
गुलामी के लिये खंजर बनुगा।
रकीबों गर हुआ तो होगा ये भी।
तुम्हारे कल्ब में नश्तर बनुंगा ।
तेरे दिल के मकां में जाने जाना ।
मैं ही दीवार मैं ही दर बनुंगा ।
राजीव

Friday, August 14, 2015

हमेशा मुश्किलों की शक्ल में है।

हमेशा मुश्किलों की शक्ल में है।
सुकूने दिल गमों की शक्ल में है।
पढे लिक्खों की दुनियां में रिफाकत।
किसी से रंजिशो की शक्ल में है।
मुहब्बत की कहानी हर किसी की
अधूरी ख्वाहिशों की शक्ल में है
जिसे अपना कहा था आज वो ही।
नुकीले खंजरों की शक्ल में है।
हिमायत गर करुं ईमान की तो ।
जमाना दुश्मनों की शक्ल में है।
खुदा भी छोङ कर दैरो हरम अब।
जहां में रोटियों की शक्ल में है।
मुकद्दर आईना है मुफलिसों का ।
हुकूमत पत्थरों की शक्ल में है।
हमारे मुल्क में महंगाई जैसे ।
भयानक डायनों की शक्ल में है।
सदाकत देखिये अच्छे दिनों की
सियासी साज़िशों की शक्ल में है
राजीव कुमार
दैरो हरम - मंदिर मस्जिद
सदाकत - सच्चाई
रिफाकत- दोस्ती

शत शत नमन भारत रत्न डा0 ए पी जे अब्दुल कलाम साहब

शत शत नमन भारत रत्न डा0 ए पी जे अब्दुल कलाम साहब
हम हार गए आज अपने जिस्मो जान से
कुछ कह भी न सकेंगे दिले बेज़बान से
जज्बा जूनून जोश रवानी ओ फुक्र भी।
सब देके वो चला गया हिन्दोस्तान से
बच्चो लो अब तुम्हारे हवाले हैं मेरे ख्वाब।
देखा करूंगा अब मैं तुम्हें आसमान से
जीना तो इस तरह कि सलामी दे जिन्दगी।
रुख्सत के वक्त देखना निकलोगे शान से।
मजहब बना के मुल्क को सीने से लगा लो।
दुनिया हिला न पायेगी तुमको ईमान से ।
मुझको न याद करना मगर ये न भूलना।
कुछ भी बङा नहीं मेरे भारत महान से।
राजीव कुमार
फुक्र - साधु सज्जनता

कहीं गाधी नहीं मिलते कहीं गौतम नहीं मिलते ।

कहीं गाधी नहीं मिलते कहीं गौतम नहीं मिलते ।
कहीं अब मुल्क में क्युं अम्न के परचम नहीं मिलते
अभी इतना ही सोचा था कि इक किस्सा लगा कहने।
सुदामा कृष्ण के जैसे मुझे हमदम नहीं मिलते
सियासत की हवा जबसे फजाओं में घुली तब से
दिवाली ईद होली के हसीं मौसम नहीं मिलते
अना के साथ हैं जो छोङं कर ईमान और गैरत
वो हमसे मिलना चाहे तो भी उनसे हम नहीं मिलते।
राजीव कुमार

सबसे रिश्ता निभा के देख लिया

गजल
सबसे रिश्ता निभा के देख लिया
झूठ सच आजमा के देख लिया ।
दिल को पत्थर बना के देख लिया।
दर्द में मुस्कुरा के देख लिया ।
खुद से खुद को मिला के देख लिया
आज शीशा उठा के देख लिया
जख्म भरते नहीं नुमाईश से।
हमने सबको दिखा के देख लिया
इश्क में कुछ नहीं मिला लेकिन
आसमां सर उठा के देख लिया
शायरी छोङ कर करूंगा क्या ।
रात भर दिल जला के देख लिया
राजीव कुमार

सोचा है देख कर ये लोगों की बेरुखी को

गजल आप सभी की मोहब्बतों के हवाले
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सोचा है देख कर ये लोगों की बेरुखी को
ठुकरा न दूं किसी दिन दुनियां की हर खुशी को।
मजहब सिखा रहे हैं आपस में बैर रखना
इल्जाम दे रहे हो क्यूं सिर्फ आदमी को
हर शक्स ढो रहा है कंधे पे जिस्म अपना ।
रोटी कमा के जिन्दा रक्खा है जिन्दगी को।
मौला वो दिन भी आये इक रोज इस जहां में।
सागर से मीठा पानी बहने लगे नदी को।
नाकामियों का अपनी जब तब्सिरा करोगे।
तब देख पाओगे तुम भीतर छुपी कमी को।
बारिस हवायें मौसम यादें भी आपकी हैं।
सब कुछ तो मिल गया है अब मेरी शायरी को
राजीव कुमार
तब्सिरा -- समिक्षा

फकत दौलत से दुनियां में गुजारा हो नहीं सकता

महफिल के हवाले
फकत दौलत से दुनियां में गुजारा हो नहीं सकता
खुदा तेरे सिवा कोई सहारा हो नहीं सकता
यकीनन एक दिन मिट्टी में हम मिल जायेंगे लेकिन ।
हमारे बाद कोई भी तुम्हारा हो नहीं सकता
वफा ईमान गैरत दीन दुनियां और मेरा दिल ।
समंदर इनसे ज्यादा और खारा हो नहीं सकता ।
बुलंदी तुझको तकती है तू उसको तकता है लेकिन।
फकत तकते ही रहने से खसारा हो नहीं सकता
अरे क्यूं वक्त जाया कर रही है जिन्दगी मुझ पर।
कोई मर कर कभी जिन्दा दुबारा हो नहीं सकता
राजीव कुमार

कहां अब कोई रिश्ता रह गया है।

गजल (महफिल ए गजल)
कहां अब कोई रिश्ता रह गया है।
जहां में सिर्फ पैसा रह गया है।
मुहब्बत बांटता था वो जहां में ।
जो अब सूली पे लटका रह गया है।
चले आये हैं वापस घर नमाजी ।
खुदा मस्जिद में तन्हा रह गया है।
जनाजे उठ रहे हैं आरजू के।
मगर वो शक्स जिन्दा रह गया है।
वरक जो फट चुका है आशिकी का।
किताबों में वो किस्सा रह गया है।
बहार ओ गुल फजायें सब तुम्हारी।
मिरे हिस्से में सहरा रह गया है।
मुहब्बत करके भी ये दिल हमारा ।
अकेला था अकेला रह गया है।
गजल ये भी मुक्मल हो न पायी ।
अभी मक्ता हमारा रह गया है।
राजीव कुमार

राहों मे इश्क के ये अलम और कितनी देर


राहों मे इश्क के ये अलम और कितनी देर
रस्मों रवायतो के सितम और कितनी देर
मुद्दत के बाद आये वो ख्वाबों में एक रोज।
गर है करम तो ये करम और कितनी देर
मेरा मिजाज हुस्न तेरा और ये शमां ।
मुझसे रहेगा दूर सनम और कितनी देर ।
आंखों में उसका अक्स है जो सामने नहीं।
कायम रहेगा ये भी वहम और कितनी देर
अब और कितनी देर ये रंजिश ये नफरतें।
आखिर लङेंगे दैरो हरम और कितनी देर
रिस्ता ए दिल भी अब तो जरूरत का नाम है।
तू मेरे बहम है तो बहम और कितनी देर

राजीव कुमार
वहम -- झुठी मान्यता
बहम - साथ
अलम -- दुख
दैर ओ हरम - मंदिर मस्जिद

जो लोग मुहब्बत में मजा ढूंढ रहे हैं।

जो लोग मुहब्बत में मजा ढूंढ रहे हैं।
नादान मुसीबत में मजा ढूंढ रहे हैं
हम अब भी सराफत में मजा ढूंढ रहे हैं
लो देख लो गुर्बत में मजा ढूंढ रहे हैं
मस्जिद से नमाजी भी लौट आये है सारे ।
हम हैं कि इबादत में मजा ढूंढ रहे हैं।
है इश्क तो दिल से न जुबां पर यूं लाईये।
अब लोग मलामत में मजा ढूंढ रहे है
खोया है हमने जब से तुम्हें तब से जानेजा।
हर सिम्त अकीदत में मजा ढूंढ रहे है
बाईक पे नैनीताल में बरसात का मौसम ।
क्या आप भी जन्नत में मजा ढूढ रहे हैं।
"आशा" न मिल सकी न मिले "राम" जेल में।
वो हैं कि जमानत में मजा ढूंढ रहे हैं।
बच्चे जवान हो गये है आप के और आप
इस उम्र में उल्फत में मजा ढूंढ रहे हैं
राजीव कुमार

जमीं को चूमता अंम्बर दिखाई देता है।

ग़ज़ल 

जमीं को चूमता अंम्बर दिखाई देता है।
बहुत हसीन ये मंजर दिखाई देता है

घटाओं क्या तुम्हे बेघर दिखाई देता हे
तुम्हे तो मेरा ही छप्पर दिखाई देता है

कमाल ये नहीं के शीशे का है दिल मेरा 
कमाल ये है कि पत्थर दिखाई देता है 

छुआ जमीं को जहां पांव से खुदा तूने।
उसी जमीन पे पुष्कर दिखाई देता है 

ख्याले यार जो मेरा न हो सका लेकिन
मुझे वो ख्वाब में अक्सर दिखाई देता है।

हजारों कत्ल की साजिश में नाम है उसका
तुम्हे जो मुल्क का रहबर दिखाई देता है।

फकत मिजाज नहीं काम से भी देखें तो।
हमारा शाह भी हिटलर दिखाई देता है।

राजीव कुमार

🙏🙏
पुष्कर -- सरोवर

मुहब्बत है क्या अब दिखा दिजिये

मतला
मुहब्बत है क्या अब दिखा दिजिये
हमारी तरह दिल जला दीजीये
मरीजों को दिल की दवा दीजिये
हमें आप भी अब दुआ दीजिये।
हमें अपने दिल से मिटा दिजीये
हमें आशिकी की सजा दिजीये
लबों से लगा के हमें जानेजा
गजल क्या हे हमको बता दीजिये
निगाहों से बातें बहुत हो चुकी
इरादा है क्या अब बता दिजीये
हमें मशवरा दे रहें हे जो दानिश
उन्हें आईना तो दिखा दिजीये
जहां में हमारा ठिकाना नहीं ।
हमें अपने दिल का पता दिजीये
ये शर्मो हया सादगी के तकल्लूफ।
ये पर्दे किसी दिन हटा दीजीये ।
सलामत रहेगी मुहब्बत हमारी।
हमें आप बेशक मिटा दिजीये।
राजीव कुमार

सितम हुस्न का हम पे ढाना मना है

सितम हुस्न का हम पे ढाना मना है
सताना हमें जाने जाना मना है
किसी के लिये पास आना माना हे
किसी के लिये दूर जाना मना है
किसी के लिये कुछ भी मुश्किल नहीं तो
किसी के लिये कुछ भी पाना मना है
कोई दिल में रहता हे इक ख्वाब बन के
किसी का तो ख्वाबों में आना माना है
मुहब्बत की गलियों में जब चाहो आओ।
ये किसने कहा आना जाना मना है
सुरों से नवाजा नहीं गर खुदा ने।
तो क्या बेसुरा गुनगुनाना मना है।
हैं रौसन दिलो में दिये इल्म के तो
चरागों को नाहक जलाना मना है
अमीरों को बदनाम यूं ही न करीये ।
कहां आप को भी कमाना मना है
नहीं शेर कहना है महफिल में तो फिर ।
फकत हाजिरी यूं लगाना मना है
अमीरों के हों या गरीबों के रिश्ते।
किसी पर भी ऊंगली उठाना मना है
हम अपने ख्यालों में उलझे हैं लेकिन
हकीकत को कागज पे लाना माना है
ले अब शायरी कर रहा हुं शूरु मैं।
ख्यालों से अब तेरा जाना माना हे।
लङाई हकों की लङें भी तो कैसे ।
गर अपने ही घर सर उठाना मना हे।
अगर तू तेरे हाल पर खुश नहीं तो
तेरा दर्द यूं ही दबाना मना है
ये अच्छे दिनों के नये दिन हैं यारों
मगर इन दिनों मुस्कुराना मना है
राजीव कुमार

हमारे दिल को जानेंजा भला कब तुमने समझा हे

गजल
हमारे दिल को जानेंजा भला कब तुमने समझा हे
समंदर कल भी प्यासा था समंदर अब भी प्यासा हे।
कई अहसास लेकर साथ जीना पङ रहा हे अब
न जाने कौन सा अच्छा बुरा बेहतर है उम्दा हे
मेरी हस्ती मेरी दुनिया मेरा लहजा मेरी खुशियां।
यही अब देखना है साथ मेरे कौन चलता है।
सहर से शाम तक की उम्र जी कर ये समझ आया
ये जीना भी है क्या जीना कि जब हर रोज मरना है।
जमाने की खिलाफत से बहुत उकता गया हुं मैं ।
किया है फैसला अब तो मुझे खुद से ही लङना है।
राजीव कुमार

कूछ यूं हुए थे कल शेर हजल गजल रिमिक्स

कूछ यूं हुए थे कल शेर हजल गजल रिमिक्स wink emoticon wink emoticon
नहीं करना मुहब्बत क्या करोगे।
हमारे साथ क्या झगङा करोगे
मैं जब भी सच के हक में बोलता हुं
मुझे लगता है तुम हमला करोगे
हमें तुम भूल भी जाओ तो जांना।
हमें ही ख्वाब में देखा करोगे।
बहुत देखे हैं हमने इम्तिहां भी।
कहो कैसे हमें रुस्वा करोगे
जो मेरे कद का आधा भी नहीं है।
उसे क्या खींच कर लम्बा करोगे।
😜
हमारी भैस भी अब पूछती है
मुझे काले से कब गोरा करोगे ।
😜🐮🐮🐮🐮🐮🐮
हमें भटका दिया तो जान लो ये
हमारे साथ तुम भटका करोगे
😀
मियां उल्फत में धोखा खा के देखो।
गजल में फिर नहीं अटका करोगे
😀
मेरे जैसा अगर शायर बने तो
तुम अपने आप को गंजा करोगे।
राजीव कुमार

हम अपनी जिन्दगी को हर घङी यूं आजमाते हैं

हसांते हैं रूलाते हैं सताते हैं मनाते हैं
हम अपनी जिन्दगी को हर घङी यूं आजमाते हैं
जबां है तल्ख जिनकी उनसे तो खतरा नहीं लेकिन ।
बहुत सीरी जबां वाले ही अक्सर मार जाते हैं
मुझे मिट्टी में जब चाहो मिला देना मगर सुन लो
फकीरों के मजारों पर ही सब चादर चढाते हे
कई दिन तक में अपने आप से कुछ कह नहीं पाता।
मगर कुछ दिन भी मुझसे फेर कर मुंह लौट जाते हे
नयी दुनिया नयी नस्लें नयी तहजीब है लेकिन ।
न जाने दोस्तों को लोग क्यूं दुश्मन बुलाते हैं
खिलाफत में हमारे इससे ज्यादा क्या कहेंगे वो।
जो हमको भी किसी दर्जे का अब शायर बताते हैं
राजीव कुमार

Monday, June 8, 2015

जाने ख़ुदा को लोग किधर ढूंढ रहे हैं।

, ताजा गजल
दिल में तो है सभी के मगर ढूंढ रहे हैं
जाने ख़ुदा को लोग किधर ढूंढ रहे हैं।
जंगल ये कंकरीट के जब से उगे यहां।
हम तब से परिदों के शजर ढूंढ रहे हैं।
हर रास्ता हो इश्क़ इबादत हो हर गली।
ख़्वाबों में हम भी ऐसा नगर ढूंढ रहे हैं ।
फ़ितरत है उसकी सबको मिटाता है इस लिये ।
हर ग़म को मिटा दे वो ज़हर ढूंढ रहे हैं।
क़िस्मत ख़राब है कि तबीयत में है कमी
हम कबसे दुवाओं मे असर ढूंढ रहे है
भेजा था जिनको मुल्क की सरहद पे उन्हीं के
मां बाप अपने लख़्ते जिगर ढूंढ रहे हैं
संसद में जाईये वहां सब साथ मिलेंगे।
मुजरिम हमारे घर में किधर ढूंढ रहे हैं।
राजीव कुमार
twitter- raj28094

इस शहरे तरक्की की सदाकत कहां गयी

इस शहरे तरक्की की सदाकत कहां गयी
बुनियाद तो वहीं है इमारत कहां गयी
इन सारे फसानों की हकीकत कहां गयी।
सूरत तो ठीक है मियां सीरत कहां गयी।
मौका मिला है आज शरीफो को देखिये ।
मत पूछियेगा इनसे सराफत कहां गयी ।
मुजरिम हुं मैं अगर तो सजा दे कोई मुझे
आखिर जमाने भर की अदालत कहां गयी
इक दौर कृष्ण और सुदामा का था मगर।
अब सोचता हुं ऐसी रिफाकत कहां गयी।
दुश्मन भी पूछने लगे क्या बात है राजीव।
मुझसे तेरी वो रंजो अदावत कहां गयी
राजीव कुमार
@raj28094

जोर जुल्मत बेनियाज़ी हर बला आबाद है


तू फरिश्ता है या खुदा, क्या है।

तू फरिश्ता है या खुदा, क्या है।
मेरे मालिक तू ही बता क्या है।
मुल्क तक्सीम हो गये लेकिन ।
ये जमीं किसकी है घटा क्या है।
ले के आयेंगा अच्छे दिन कोई।
झूठ इससे बङा बता क्या है ।
है जहर आज कल फिजाओं में।
आज मजहब की ये हवा क्या है।
शक्लो सूरत तेरी गजल वाली।
तेरे आगे ये आइना क्या है।
हर सहर शाम तेरी ही बातें ।
मेरा मुझमें तेरे सिवा क्या है।
इश्क मुझसा अगर करोगे तो।
ये समझ जाओगे सजा क्या है।
राजीव

इतनी दौलत किसान रखता है।

ग़ज़ल 
🙏🙏🙏🙏🙏🙏
कुछ नहीं बस ईमान रखता है।
इतनी दौलत किसान रखता है।

देश की आन बान रखता है
साथ गीता कुरान रखता है

आग पानी हवा सियासत उफ्फ।
कितनी आफत में जान रखता है।

रूह घायल कहीं न दिख जाये।
सो बदन पर निशान रखता है।

छत नहीं है तो गम नहीं उसको।
सर पे वो आसमान रखता है।

हक की बातें करे तो कहते हो
कितनी लम्बी जबान रखता है।

वक्त से पहले हो गया बूङा।
और  बेटी जवान रखता है।

घर आयेंगी एक दिन ख़ुशियाँ
बस यही इत्मीनान रखता है।

जेब खाली तो है मगर राजीव
दिल में दोनो जहान रखता है।

राजीव कुमार

किसे यकीन है क्या क्या बदल रहा होगा


आईने के सामने जब आईना रक्खा गया ।

ग़ज़ल

आईने  के  सामने  जब  आईना  रक्खा  गया।
तब किसी का नाम शायद बेवफ़ा रक्खा गया।

इम्तिहां  हर  सिम्त  मेरा  हमनवा रक्खा गया।
और   मुझसे   दूर  मेरा   रहनुमा  रक्खा  गया।

जब  जरूरत  ज़िन्दगी  की ज़िन्दगी लेने लगी।
तब से पैसा भी जहां का इक ख़ुदा रक्खा गया।

इक  परिंदा  पूछ  बैठा  क्या हुई  मुझसे खता।
क़ैद में  मुझको ख़ुदाया क्यूं  भला रक्खा गया।

क़त्ल करके ख़ुदकुशी का वो ख़ुशी हांसिल हुई।
जिसको पाने के  लिये मैं गमज़दा  रक्खा गया।

इस  समंदर  की हकीकत  साहिलों से  पूछिये।
जिनके  हिस्से तिश्नगी  का फैसला  क्खा
गया।

रात   भर  तन्हाईयों में  मैं ग़ज़ल  कहने  लगा।
जबसे मुझको दूर तुझसे दिलरुबा रक्खा गया।

राजीव कुमार

तेरी खातिर मैं अब तुझको सतना भूल जाता हूँ


मुझसे पहचान अपनी छुपाता गया।

ताजा गजल
मुझसे पहचान अपनी छुपाता गया।
और इल्जामे उल्फत लगाता गया ।
आशिकी को मेरी आजमाता गया ।
मुझको संगदिल जमाना सताता गया ।
खूबसूरत खता कर न दूं एक दिन।
गर वो ख्वाबों ऐसे ही आता गया।
शब में इक रोज मिलने गया यार से।
रास्ता मुझको जुगनू दिखाता गया ।
उस भरी बज्म में जिसमें रुस्वा हुआ।
हर कोई मुझको झूठा बताता गया ।
हर सितम सह के भी दिल मिरा दोस्तों।
मुस्कूराता रहा मुस्कुराता गया ।
राजीव कुमार

सवालों का जो खुद उत्तर बना है

सवालों का जो खुद उत्तर बना है
वही शायर सही शायर बना है।
फकत दो चार चमचों के सहारे
गजल का आज वो हैदर बना है।
अना की कैद को जो तोङ आया
वही इन्सान पैगम्बर बना है।
जला है इम्तिहां की आग में जो।
बलंदी का वही अख्तर बना है
कहां तक आईना सच बोल पाता
किसी का अक्स ही पत्थर बना है
जहां हैं दफ्न आशिक आगरा में ।
मुहब्बत का वहीं मंदिर बना है
राजीव कुमार
अख्तर- सितारा
हैदर -शेर

झूठ नफरत बेईमानी सोलह आने हो गये।

झूठ नफरत बेईमानी सोलह आने हो गये।
और ये ईमान के सिक्के पुराने हो गये।
खुद के हिस्से की खुशी को छोङ कर पाला जिन्हें।
आज वो बच्चे ही अपनो से बेगाने हो गये।
हादशों का सिलसिला भी खत्म कर दे ए खुदा
अब मकां मजहब के सारे कत्ल खाने हो गये।
बस जरा सी देर वो आये चमन में घूमने ।
क्या कली क्या फूल तितली सब दिवाने हो गये
मुफलिसी का दौर जारी था, रहेगा, देखिये।
हुक्मरां इस मुल्क के फिर कुछ घराने हो गये।
है हकीकत क्या तरक्की की यकीं किस पर करें।
मण्डीयों से मीडीया के दोस्ताने हो गये ।
राजिव कुमार

शीसा दिल मेरा पत्थर है ।

---------- गजल पेश है
शीसा दिल मेरा पत्थर है ।
पहले से ज्यादा बेहतर है।
जीवन के रस्तों में शायद
अपनी किस्मत में ठोकर है
इश्क वफा ईमान जहां में
तेरे बिन सब कुछ बद्तर है
गुलसन तो महका है लेकिन
फूलों को कांटों का डर है
मस्त हवाओं में जाने जां
तेरी खुश्बू का नस्तर है
धरती पर रहने वालों की।
आंखों में रहता अम्बर है।
दूनियां के हर विष को पी लूं।
मेरे भीतर भी शंकर है।
राजीव कुमार

जिन्दजी ऐसी नहीं है कि जैसे पिक्चर में

अपने पसंदीदा शायर समीर परीमल साहब के साथ मिल कर कही गजल

जिन्दजी ऐसी नहीं है कि जैसे पिक्चर में
आधी जूते में गुजरती हे आधी बिस्तर में
राजीव
कितने गफलत में गुम है आज का इन्सां यारों।
पहले खोया था सवालों में अब है उत्तर में
राजीव
शेर कहते रहे यूँ ही तो है यकीं मुझको
आपके लफ्ज़ जान फूंक देंगे पत्थर में
समीर
जेब खाली हे मगर इतनी हे सोहरत हासिल।
सारी दुनियां की मुहब्बत हे मेरे छप्पर में
राजीव
उम्र गुज़री तमाम ढूँढने में 'परिमल' को
ख्वाब में रात इक काटी थी जो तेरे घर में
समीर
समीर परीमल और राजीव कुमार

मुश्किल के वक्त जब मैं तेरे काम न आया।

गजल
मुश्किल के वक्त जब मैं तेरे काम न आया।
मुझको भी यार उन दिनों आराम न आया।
तुने वफा की परवरिश की थी कुछ इस तरह
मुझ पर जफा का एक भी इल्जाम न आया।
सरहद के आर पार जो उङते हैं परिंदे।
उनको कभी भी खौफ ए तह ए दाम न आया।
इक सुब्ह आफताब उम्मीदों का उगा था।
ता उम्र चला साथ लब ए बाम न आया
दिल से ख्याले यार का मिट जाये हर खयाल।
ऐसा भी कोई गर्दिश ए अय्याम न आया।
न अश्क न वफा न दुआ दर्द आशिकी
अपना जिसे माना था वही काम न आया।
मेरा यकीन था कि तू आयेगा एक दिन।
मौत आ गयी मगर तेरा पैगाम न आया।
यूं तो हर इक सितम का तआल्लुक तुझी से था।
लेकिन मेरे लबों पे तेरा नाम न आया।
राजीव कुमार
खौफे तहे दाम - जाल में पकङे जाने का डर
लब ए बाम-- सूरज का ढलते समय एक किनारे आ जाना
गर्दिशे अय्याम - बुरा दौर

परिंदा जो उङा था कैद ए जां से।

पूरी गजल आप की मोहब्बतों के हवाले
परिंदा जो उङा था कैद ए जां से।
न आया लौट कर वो आसमां से।
जगह खंजर की बंदूखों ने ले ली।
कहां तक आ गया इन्सां कहां से।
हसीं मौसम गम ए तन्हाईयों को।
बयां करने लगा है अब जुबां से।
किसी भी हादसे का डर नहीं है।
दुवायें ले के मैं आया हुं मां से।
यकीं तुम पे तो है पर दिल तुम्हारा।
पलट जाता है आपने हर बयां से।
मुहब्बत करने वाला जानता है
मिला क्या है उसे इस रायगां से।
वफा ईमान गैरत क्या संभालुं।
बहुत कांटे मिले हैं इस जहां से।
राजीव कुमार
(रायगां --- तबाही)

Friday, February 20, 2015

खुदा की मुझ पे रहमत हो गयी है

*आप को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं*

ख़ुदा की मुझ पे रहमत हो गयी है
फ़कीरी मेरी शोहरत हो गयी है।

जिसे मुझसे शिकायत हो गयी थी
उसे मुझसे मुहब्बत हो गयी है

लगे कटने शजर जब से यहां पर
परिंदों को मुसीबत हो गयी है

हे जिनके हाथ में परचम अमन का।
उन्हीं की आज दहशत हो गयी है

तितलियाँ आ रहीं हैं तेरी जानिब।
गुलों सी तेरी रंगत हो गयी हे ।

किया है क़त्ल जब से बुज़दिल का।
रक़ीबों से मोहब्बत हो गयी है।

किसी के पास तूफ़ां है तो लाये ।
मुझे मिलने की हसरत हो गयी है

गिरावट देख कर किरदार में अब।
पढे-लिक्खों से नफ़रत हो गयी है

हुई हिम्मत जवां तो यार मेरे
मुक़द्दर को फ़ज़ीहत हो गयी है

वफ़ा ईमान ग़ैरत क्या सँभालूँ ।
बङी मुश्किल रिफ़ाक़त हो गयी है।

*दिया दिल में मेरे जलने लगा तो ।*
*दिवाली ख़ूबसूरत हो गयी है*

राजीव कुमार

रिफ़ाक़त-- दोस्ती

फूलों की चाह छोङ के पत्थर उठा लिया ।

एक गजल आप सभी की मोहब्बतों के हवाले
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फूलों की चाह छोङ के पत्थर उठा लिया ।
देखो हर इक सवाल का उत्तर उठा लिया ।
अदने से आदमी ने की हिम्मत तो देखिये।
लड़ने को इक पहाड़ से कंकड़ उठा लिया ।
ले कर जो चल रहे थे नसीबों के कारवां ।
उनके ही घर से उनका मूकद्दर उठा लिया ।
सैलाब जिन्दगी के समंदर में जब उठा ।
हमने भी अपने नाव का लंगर उठा लिया।
हर सिम्त रहजनों की हूकूमत को देख कर।
कंधे पे राहगीर ने रहबर उठा लिया ।
ईमान में कुछ जान तो बाकी थी इस लिये।
दुनियां ने सूट फैंक के मफलर उठा लिया ।
राजीव कुमार

अच्छे दिनों की बात से देखो मुकर गये ।

एक फिल बदीह गजल
अच्छे दिनों की बात से देखो मुकर गये ।
देखो वो काले धन के भी सौ दिन गुजर गये।
हुंकार रैलियों में ही दिखती रही फकत।
अबतक जवान कितने ही बे मौत मर गये।
वादों के शोर गुल में दर्द दब गया कहीं।
सारे किसान अपने ही खेतों से डर गये।
मुश्किल सवाल एक खङा और हो गया।
कितने यतीम घर को बता लौट कर गये।
गर्दो गुबार जुल्म सितम सब है अब तलक।
मंजर यही दिखा हमें जब भी जिधर गये
राजीव कुमार

कब दीवानापन देखा है

तरही गजल
कब दीवानापन देखा है
तुमने सिर्फ सुखन देखा है
दिल में रहने वालों ने कब
आंखो में सावन देखा है
बेबस बेकल चंचल कोमल।
हमने सबका मन देखा है
दुनिया को समझाने वालों।
क्या तुमने दरपन देखा है
रस्ते में मिलता है अक्सर ।
हमने वो रहजन देखा है।
दिलवालों को इस दुनिया ने।
जाने क्यूं दुश्मन देखा हे।

हमने तुमको खो कर  जांना।
बस आवारापन देखा है
राजीव कुमार
दो बोनस शेर
सबके खाते में आयेगा ।
किसने काला धन देखा हे।
आधे से ज्यादा हैं खाली ।
क्या तुमने जनधन देखा हे

Saturday, February 7, 2015

बङ गई मुश्किलें तब गगन के लिये ।

गजल आप की मोहब्बतों के हवाले
बङ गई मुश्किलें तब गगन के लिये ।
जब कबूतर उङाये अमन के लिये ।
शाम सूरज उम्मिदों का जब डल गया।
इक दिया जल उठा फिर किरन के लिये ।
शक्लों सूरत है दिलकश अदा है मगर।
क्या कहुं मैं तेरे काले मन के लिये।
गर हूकूमत में आये तो लायेंगे हम ।
झुठ बोला गया काले धन के लिये
पहली तनख्वा से इस देश में आज भी।
भाई लाता है तौहफे बहन के लिये ।
पूरे दिन धूप में हंस के जलता रहा।
फूल वो जो खिला था चमन के लिये।
रफ्ता रफ्ता गजल हो रही है जवां
कीजिये सब्र थोङा सुखन के लिये ।
राजीव कुमार

Saturday, January 17, 2015

इस समंदर की तिस्नगी देखो।

बस यूं ही ___________
इस समंदर की तिस्नगी देखो।
दिल में कोई तो है कमी देखो।

जिससे मिलती है वो खुशी देखो।
अपने अन्दर की रौशनी देखो।

बात मजहब की कर रहे हो तो।
आग मजहब की फिर लगी देखो ।

दर्द की हद भी और क्या होगी।
लाश बच्चों की गिर गयी देखो।

जिनके रौशन चराग बुझ जाये।
घर में उनके भी तीरगी देखो।

खुशनुमा इक ख्याल है कोई।
कोई आंखों में है नमी देखो।

जब भी उल्फत में तुम कदम रक्खो।
इस जमाने की बेदिली देखो ।

चांद की चाह है सभी को पर ।
चांदनी कोख में मरी देखो।

राजीव कुमार

साथ जब तक रहेगी मेरी जिन्दगी।

साथ जब तक रहेगी मेरी जिन्दगी।
तू रहेगी मेरी हर घङी जिन्दगी।

तू नहीं थी तो कुछ भी नहीं था यहां।
थी हर इक शै में कोई कमी जिन्दगी

मेरी किस्मत भी तू मेरी चाहत भी तू।
मेरे ख्वाबों की तू है परी जिन्दगी ।

तेरा रिश्ता है मुझसे पूराना सनम ।
दिल है सागर मेरा तू नदी जिन्दगी

उङती हैं तितलियां जो लबों पर तेरे।
तेरी मुस्कान खिलती कली जिन्दगी ।

मुझपे इतनी इनायत तो कर दे खुदा ।
यार दे दे या दे फिर नयी जिन्दगी ।

मैं तङपता रहूं तू तङपती रहे ।
किस लिये इतनी ये बेबसी जिन्दगी ।

दिल में तन्हाईयों के अंधेरे न कर ।
है मुहब्बत की तू रौशनी जिन्दगी।

मेरा कुछ भी नहीं ये गजल है तेरी
तू ही गम हे तूही हे खुशी जिन्दगी।

राजीव कुमार

जब मिलो तो जरा मूस्कूरा कर मिलो ।

जब मिलो तो जरा मूस्कूरा कर मिलो ।
आओ बैठो जरा पास आ कर मिलो।

दिल में इक दर्द है दूरीयों का मगर ।
दिल दिया है तो दिल को मिला कर मिलो।

हो गयी है ये दिलकश फिजा सबनमी।
इन गुलों से भी तो खिलखिला कर मिलो ।

खार हमने जमाने के देखे हैं सब ।
खार से यार बाहें उठा कर मिलो ।

दिल का अब तक खुला है दरीचा मेरा ।
आ भी जाओ सनम आज आ कर मिलो।

राजीव कुमार

चाहता मैं नहीं लोग जहमत करें।

गजल

चाहता ही  नहीं लोग जहमत करें।
लोग मुझसे न यूं ही मुहब्बत करें।

जिनको सच बात सुनने की आदत नहीं।
इल्तजा है कि वो मुझसे नफरत करें।

आज सहरा भी दरिया से कहने लगा।
आ भी जा कब तलक तेरी मिन्नत करें।

दीन , ईमान , गैरत, वफा, जिन्दगी ।
तेरी खातिर बता किसको रुक्सत करें।

टूटा फूटा सही पर तेरा घर है ये।
तू जो आये तो दिल की मरम्मत करें

राजीव कुमार

दिलों की बङ रहीं ये दूरियां अच्छी नहीं लगती।

ग़ज़ल

दिलों के बीच बढ़ती दूरियां अच्छी नहीं लगती।
नये इस दौर की ये ख़ामियाँ अच्छी नहीं लगती।

हमें मालूम है ज़ीने की ख़ातिर है ज़रूरी पर।
हमें फेकी हुई ये रोटियां अच्छी नहीं लगती।

हमेशा डूब ही जाती हैं उल्फ़त के समंदर में।
महब्बत की शिकस्तां कश्तियां अच्छी नहीं लगती

संदेशे में मेरी माँ ने यही लिक्खा था कि बेटा।
तुम्हारी राह तकती खिड़कियां अच्छी नहीं लगती।

मैं अक़्सर सोचता हूँ  देख कर रोती हुई बच्ची ।
न जाने क्युं किसी को तितलियां अच्छी नहीं लगती।

इसी बस्ती के कारीगर बनाते हैं महल लेकिन।
महल वालों को झुग्गी बस्तियां अच्छी नहीं लगती।

जहां इन्सान जलता है अना की आग से खुद के।
वहां माचिस की जलती तीलियां अच्छी नहीं लगती।

नहीं मिलती है जिनको गर्मियां वादों की गर्मी से।
उन्हें अच्छे दिनों की सर्दियां अच्छी नहीं लगती।

राजीव कुमार

बहुत लोगों से यारी हो गयी है।

पेश हे आभार स्वरूप एक ताजा गजल बिल्कुल अभी कही आप सभी मित्रों के नाम
दोस्तों आज मेरे जन्म दिवस पर आप सबके बधाई स्वरूप प्रेम मिला इस के लिये आप सभी का तहे दिल से शुक्रिया

बहुत लोगों से यारी हो गयी है।
के दुनिया अब हमारी हो गयी है।

दुआ इतनी मिली कि सोचता हुं ।
मेरे दिल पर उधारी हो गयी है।

कहां इसकी दवा मिलती है यारों।
मुहब्बत की बिमारी हो गयी है।

सियासी बात वो अच्छे दिनो की ।
बङी ही बे मिय्यारी हो गयी है।

तेरी वो दुश्मनी जो थी मुझी से।
मेरे आगे बेचारी हो गयी है।

वो बचपन जिन्दगी का था सुनहरा
मगर अब जंग जारी हो गयी है।

गजल में जिक्र यारी का किया है।
गजल यारों तुम्हारी हो गयी है।

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...