Friday, August 14, 2015

कहीं गाधी नहीं मिलते कहीं गौतम नहीं मिलते ।

कहीं गाधी नहीं मिलते कहीं गौतम नहीं मिलते ।
कहीं अब मुल्क में क्युं अम्न के परचम नहीं मिलते
अभी इतना ही सोचा था कि इक किस्सा लगा कहने।
सुदामा कृष्ण के जैसे मुझे हमदम नहीं मिलते
सियासत की हवा जबसे फजाओं में घुली तब से
दिवाली ईद होली के हसीं मौसम नहीं मिलते
अना के साथ हैं जो छोङं कर ईमान और गैरत
वो हमसे मिलना चाहे तो भी उनसे हम नहीं मिलते।
राजीव कुमार

No comments:

Post a Comment

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...