गजल
चाहता ही नहीं लोग जहमत करें।
लोग मुझसे न यूं ही मुहब्बत करें।
जिनको सच बात सुनने की आदत नहीं।
इल्तजा है कि वो मुझसे नफरत करें।
आज सहरा भी दरिया से कहने लगा।
आ भी जा कब तलक तेरी मिन्नत करें।
दीन , ईमान , गैरत, वफा, जिन्दगी ।
तेरी खातिर बता किसको रुक्सत करें।
टूटा फूटा सही पर तेरा घर है ये।
तू जो आये तो दिल की मरम्मत करें
राजीव कुमार
चाहता ही नहीं लोग जहमत करें।
लोग मुझसे न यूं ही मुहब्बत करें।
जिनको सच बात सुनने की आदत नहीं।
इल्तजा है कि वो मुझसे नफरत करें।
आज सहरा भी दरिया से कहने लगा।
आ भी जा कब तलक तेरी मिन्नत करें।
दीन , ईमान , गैरत, वफा, जिन्दगी ।
तेरी खातिर बता किसको रुक्सत करें।
टूटा फूटा सही पर तेरा घर है ये।
तू जो आये तो दिल की मरम्मत करें
राजीव कुमार
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