गजल पेश ए खिदमत तवज्जो तलब
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तङप कर रोज खुद से पूछता हुं ।
मैं तन्हा क्युं अभी तक जी रहा हूं।
मैं तन्हा क्युं अभी तक जी रहा हूं।
जूदा होकर ही मैं भी जान पाया
तुम्हे ही ख्वाब में क्युं ढूंढता हुं ।
तुम्हे ही ख्वाब में क्युं ढूंढता हुं ।
तुम्हारा नाम ही नीकळे जुबां से
मैं जब भी नींद में कुछ बोलता हुं ।
मैं जब भी नींद में कुछ बोलता हुं ।
मुकम्मल हो नहीं पाया कभी भी।
कोई पेंचीदा किस्सा बन गया हुं
कोई पेंचीदा किस्सा बन गया हुं
जिसे जो भी समझना है वो समझे।
मैं दिल की बात सारी कह चुका हूँ।
मैं दिल की बात सारी कह चुका हूँ।
राजीव कुमार
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