एक फिल बदीह गजल
अच्छे दिनों की बात से देखो मुकर गये ।
देखो वो काले धन के भी सौ दिन गुजर गये।
देखो वो काले धन के भी सौ दिन गुजर गये।
हुंकार रैलियों में ही दिखती रही फकत।
अबतक जवान कितने ही बे मौत मर गये।
अबतक जवान कितने ही बे मौत मर गये।
वादों के शोर गुल में दर्द दब गया कहीं।
सारे किसान अपने ही खेतों से डर गये।
सारे किसान अपने ही खेतों से डर गये।
मुश्किल सवाल एक खङा और हो गया।
कितने यतीम घर को बता लौट कर गये।
कितने यतीम घर को बता लौट कर गये।
गर्दो गुबार जुल्म सितम सब है अब तलक।
मंजर यही दिखा हमें जब भी जिधर गये
मंजर यही दिखा हमें जब भी जिधर गये
राजीव कुमार
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