ग़ज़ल
दिलों के बीच बढ़ती दूरियां अच्छी नहीं लगती।
नये इस दौर की ये ख़ामियाँ अच्छी नहीं लगती।
हमें मालूम है ज़ीने की ख़ातिर है ज़रूरी पर।
हमें फेकी हुई ये रोटियां अच्छी नहीं लगती।
हमेशा डूब ही जाती हैं उल्फ़त के समंदर में।
महब्बत की शिकस्तां कश्तियां अच्छी नहीं लगती
संदेशे में मेरी माँ ने यही लिक्खा था कि बेटा।
तुम्हारी राह तकती खिड़कियां अच्छी नहीं लगती।
मैं अक़्सर सोचता हूँ देख कर रोती हुई बच्ची ।
न जाने क्युं किसी को तितलियां अच्छी नहीं लगती।
इसी बस्ती के कारीगर बनाते हैं महल लेकिन।
महल वालों को झुग्गी बस्तियां अच्छी नहीं लगती।
जहां इन्सान जलता है अना की आग से खुद के।
वहां माचिस की जलती तीलियां अच्छी नहीं लगती।
नहीं मिलती है जिनको गर्मियां वादों की गर्मी से।
उन्हें अच्छे दिनों की सर्दियां अच्छी नहीं लगती।
राजीव कुमार
दिलों के बीच बढ़ती दूरियां अच्छी नहीं लगती।
नये इस दौर की ये ख़ामियाँ अच्छी नहीं लगती।
हमें मालूम है ज़ीने की ख़ातिर है ज़रूरी पर।
हमें फेकी हुई ये रोटियां अच्छी नहीं लगती।
हमेशा डूब ही जाती हैं उल्फ़त के समंदर में।
महब्बत की शिकस्तां कश्तियां अच्छी नहीं लगती
संदेशे में मेरी माँ ने यही लिक्खा था कि बेटा।
तुम्हारी राह तकती खिड़कियां अच्छी नहीं लगती।
मैं अक़्सर सोचता हूँ देख कर रोती हुई बच्ची ।
न जाने क्युं किसी को तितलियां अच्छी नहीं लगती।
इसी बस्ती के कारीगर बनाते हैं महल लेकिन।
महल वालों को झुग्गी बस्तियां अच्छी नहीं लगती।
जहां इन्सान जलता है अना की आग से खुद के।
वहां माचिस की जलती तीलियां अच्छी नहीं लगती।
नहीं मिलती है जिनको गर्मियां वादों की गर्मी से।
उन्हें अच्छे दिनों की सर्दियां अच्छी नहीं लगती।
राजीव कुमार
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