Wednesday, September 16, 2015

गजलों का दीवान बना कर रक्खुंगा


गजलों का दीवान बना कर रक्खुंगा
ऐसा हिन्दुस्तान बना कर रक्खुंगा ।
रस्म रवायत दुनियादारी इश्क वफा
सब मुश्किल आसान बना कर रक्खुंगा।
सहरा दरिया सागर अम्बर जाने दो।
सीने में तूफान बना कर रक्खूंगा।
कारों में सब यार मेरे अब चलते हैं
मैं कब तक ईमान बना कर रक्खुंगा ।
जीने की खातिर इस दुनियां में देखो।
थोङा तो सामान बना कर रक्खुंगा ।
धर्म इबादत और तिजारत तुम रक्खो।
मैं खुद को इन्सान बना कर रक्खुंगा ।
मिट्टी में मिल कर भी इक दिन मैं यारों ।
मिट्टी की पहचान बना कर रक्खुंगा ।
राजीव कुमार

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