ग़ज़ल
जमीं को चूमता अंम्बर दिखाई देता है।
बहुत हसीन ये मंजर दिखाई देता है
घटाओं क्या तुम्हे बेघर दिखाई देता हे
तुम्हे तो मेरा ही छप्पर दिखाई देता है
कमाल ये नहीं के शीशे का है दिल मेरा
कमाल ये है कि पत्थर दिखाई देता है
छुआ जमीं को जहां पांव से खुदा तूने।
उसी जमीन पे पुष्कर दिखाई देता है
ख्याले यार जो मेरा न हो सका लेकिन
मुझे वो ख्वाब में अक्सर दिखाई देता है।
हजारों कत्ल की साजिश में नाम है उसका
तुम्हे जो मुल्क का रहबर दिखाई देता है।
फकत मिजाज नहीं काम से भी देखें तो।
हमारा शाह भी हिटलर दिखाई देता है।
राजीव कुमार
🙏🙏
जमीं को चूमता अंम्बर दिखाई देता है।
बहुत हसीन ये मंजर दिखाई देता है
घटाओं क्या तुम्हे बेघर दिखाई देता हे
तुम्हे तो मेरा ही छप्पर दिखाई देता है
कमाल ये नहीं के शीशे का है दिल मेरा
कमाल ये है कि पत्थर दिखाई देता है
छुआ जमीं को जहां पांव से खुदा तूने।
उसी जमीन पे पुष्कर दिखाई देता है
ख्याले यार जो मेरा न हो सका लेकिन
मुझे वो ख्वाब में अक्सर दिखाई देता है।
हजारों कत्ल की साजिश में नाम है उसका
तुम्हे जो मुल्क का रहबर दिखाई देता है।
फकत मिजाज नहीं काम से भी देखें तो।
हमारा शाह भी हिटलर दिखाई देता है।
राजीव कुमार
🙏🙏
पुष्कर -- सरोवर
No comments:
Post a Comment