Friday, August 14, 2015

सितम हुस्न का हम पे ढाना मना है

सितम हुस्न का हम पे ढाना मना है
सताना हमें जाने जाना मना है
किसी के लिये पास आना माना हे
किसी के लिये दूर जाना मना है
किसी के लिये कुछ भी मुश्किल नहीं तो
किसी के लिये कुछ भी पाना मना है
कोई दिल में रहता हे इक ख्वाब बन के
किसी का तो ख्वाबों में आना माना है
मुहब्बत की गलियों में जब चाहो आओ।
ये किसने कहा आना जाना मना है
सुरों से नवाजा नहीं गर खुदा ने।
तो क्या बेसुरा गुनगुनाना मना है।
हैं रौसन दिलो में दिये इल्म के तो
चरागों को नाहक जलाना मना है
अमीरों को बदनाम यूं ही न करीये ।
कहां आप को भी कमाना मना है
नहीं शेर कहना है महफिल में तो फिर ।
फकत हाजिरी यूं लगाना मना है
अमीरों के हों या गरीबों के रिश्ते।
किसी पर भी ऊंगली उठाना मना है
हम अपने ख्यालों में उलझे हैं लेकिन
हकीकत को कागज पे लाना माना है
ले अब शायरी कर रहा हुं शूरु मैं।
ख्यालों से अब तेरा जाना माना हे।
लङाई हकों की लङें भी तो कैसे ।
गर अपने ही घर सर उठाना मना हे।
अगर तू तेरे हाल पर खुश नहीं तो
तेरा दर्द यूं ही दबाना मना है
ये अच्छे दिनों के नये दिन हैं यारों
मगर इन दिनों मुस्कुराना मना है
राजीव कुमार

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