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सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।
ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...
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तेरी ख़ातिर मैं अब तुझको सताना भूल जाता हूँ।
ReplyDeleteतुझे ए ज़िन्दगी चल आज़माना भूल जाता हूँ।
महब्बत दिल में है लेकिन जताना भूल जाता हूँ।
तेरी दुनियां के रस्मों को निभाना भूल जाता हूँ।
हमेशा आईना ही आख़िरी में टूट जाता है।
इसी डर से मैं सच के साथ जाना भूल जाता हूँ।
ज़रा सी बात पर भी गर मेरी बिटिया कभी रो दे।
कई दिन तक मैं यारों मुस्कुराना भूल जाता हूँ ।
जिसे भी देखिये दौलत के पीछे बावला सा है।
इधर मैं शेर कहने में कमाना भूल जाता हूँ ।
राजीव कुमार