Monday, June 8, 2015

परिंदा जो उङा था कैद ए जां से।

पूरी गजल आप की मोहब्बतों के हवाले
परिंदा जो उङा था कैद ए जां से।
न आया लौट कर वो आसमां से।
जगह खंजर की बंदूखों ने ले ली।
कहां तक आ गया इन्सां कहां से।
हसीं मौसम गम ए तन्हाईयों को।
बयां करने लगा है अब जुबां से।
किसी भी हादसे का डर नहीं है।
दुवायें ले के मैं आया हुं मां से।
यकीं तुम पे तो है पर दिल तुम्हारा।
पलट जाता है आपने हर बयां से।
मुहब्बत करने वाला जानता है
मिला क्या है उसे इस रायगां से।
वफा ईमान गैरत क्या संभालुं।
बहुत कांटे मिले हैं इस जहां से।
राजीव कुमार
(रायगां --- तबाही)

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