Thursday, December 15, 2016

जब से कोलेज तुम आ गई दिलरुबा

कुछ नया कहने की कोशिश

जब से कोलेज तुम आ गई दिलरुबा
तब से दिल बन गया जुर्म का सरगना

आशिकों के लिये तेरी हर इक अदा।
जैसे कश्मीर में लश्कर ए तय्यबा।

चांद भी सोचता रह गया क्या कहूं ।
देख कर बस तुझे देखता रह गया।

जिक्र तेरा गजल में किया जब कभी
हर किसी ने कहा मरहबा मरहबा।

इश्क सर पर मिरे चढ़ गया क्या करूं।
दोस्तो  अब मुझे ले चलो आगरा

इश्क सबके लिये है उसे छोड़ कर
जो भी उन्नीस से कम का है छोकरा

राजीव कुमार

खुद के भीतर के वीरानों, में इन्सां जो भटका है

खुद के भीतर के वीरानों, में इन्सां यूं  भटका है
जैसी बस्ती कस्बा नगरी, पैदल पैदल फिरता है।

दुनिया भर के दर्दों को भी, है उससे हमदर्दी ही।
अपने पांवों के जख्मों पर, मन ही मन जो हँसता है।

अरमानों की सूली पर जो, ज़िन्दा लटका है उसके।
सीने के भीतर इक पत्थर, धक-धक धक-धक करता है।

फूलों कांटों जुगनू रातों,  और बहारों की आंखों में।
अक्श तुम्हारा सागर बन के, छलका छलका रहता है।

सच्चा झूठा आधा पूरा ,ख्वाब हकीकत  कौन है तू ।
मेरे भीतर तू है या फिर ,मुझको बाहर रक्खा है।

राजीव कुमार

उम्र भर कौन किसका रहबर है

उम्र भर कौन किसका रहबर है
हर कोई अपने गम के भीतर है

जिन्दगी मौत की लड़ाई में ।
जीत बस एक को मयस्सर है

रोज अखबार पढ़ के ये पाया
झूठ ही अब तो सच के उपर है

दर्दे दिल दर्दे सर न हो जाये।
आशिकी चीज भी तो दूभर है

राजीव कुमार

भूखों का भगवान नहीं था।

भूखों का भगवान नहीं था।
पर कोई बेजान नहीं था।

जितना आसां है अब मरना
तब उतना आसान नहीं था

बात ये तब की है यारों जब
जीने का सामान नहीं था

हिन्दू मुस्लिम सब तो थे पर।
कोई भी शैतान नहीं था ।

मुल्क गरीबी में था जब तक
कोई तुर्रम खान नहीं था।

राजीव कुमार

दश्ते उल्फत में गया मैं तो मिला कुछ भी नहीं।

ताजा गजल

दश्ते उल्फत में गया मैं तो मिला कुछ भी नहीं।
तेरी महफिल में तेरा सब हैं मिरा कुछ भी नहीं

दर्द देने को हर इक शक्स है तैयार यहां
ऐसी दुनिया में बुरा सब हैं भला कुछ भी नहीं

ख्वाब मेरे मूझे सोने भी नहीं देते हैं ।
रात सोया था कि जागा था पता कुछ भी  नहीं

जहनो दिल में है तूही और तेरी यादें हैं ।
गौर से देख मिरा मुझमें बचा कुछ भी नहीं

ये भी सच है कि खुशी हर किसी की हसरत है
ये भी सच है कि खुशी गम के बिना कुछ भी नहीं

गर जुदा हैं तो जुदाई का लुत्फ ले तू भी ।
रोज मिलने में बिछड़ने में मजा कुछ भी नहीं।

राजीव कुमार

अदब की बज्म को मिसरा नया दूं

फिलबदीह गजल कहने की कोशिश बज्म ए अदब ग्रुप पर ---------------- देखियेगा

अदब की बज्म को मिसरा नया दूं
इजाजत हो तो मैं मतला सुना दूं

दिलों के बीच की दूरी मिटा दूं।
मोहब्बत मैं जमाने को सिखा दूं

तजुर्बा दिल्लगी से टूटने तक
मोहब्बत करने वालों को बता दूं

मुझे मिल ही नहीं पाया जो अब तक
तो मै कैसे तुझे  उसका पता दूं ।

हकीकत में न जाने कब दिखेगे
तूझे ख्वाबों में अच्छे दिन दिखा दूं

लगाने वालों मुझको लाईनों में।
तुम्हे भी एक दिन ऐसी सजा दूं

तुम्हारी प्यास बढती जा रही है
लहू क्या मैं तुम्हे अपना पिला दूं

सियासत आ गयी फिर से अदब में ।
कहो मैं खुद को इसकी क्या सजा दूं

खुदाया गर मिले एजाज तेरा
मैं सहरा को भी इक दरिया बना दूं

कफस में जिस्म के हूं कैद अब तक
तूझे ए जिन्दगी मैं और क्या दूं

राजीव कुमार

आज की बज्म का खुदा है वो

गजल

आज की बज्म का खुदा है वो
सबकी गजलों में काफिया है वो

मिरे दिल में था इस लिये शायद
मेरे शेरों में आ गया है वो

हुस्न शोला गुलाब चेहरा है
जाने किस चीज से बना है वो

जिन्दगी देती है फजाओं को
खुश्बु ए गुल की इक हवा है वो

सारा कोलेज जिसके पीछे था
यारों अब मेरी दिलरुबा है वो

हाले दिल आप दिल से मत पूछो।
आज कल इश्क से डरा है वो

आशिकी शायरी बगावत भी
कितने किरदार में ढला है वो

मुझसे कुछ काम तो नहीं उसको
मुस्कुरा कर मुझे मिला है वो

राजीव कुमार

दो शेर और है खास दोस्तो के लिये

सीधा सच्चा है और भला है वो
आज के दौर में बुरा है वो

वादा अच्छे दिनों का है जो भी
कुछ नहीं सिर्फ झुनझुना हे वो

राजीव कुमार

हम अपनी गजल गर सुनाने लगेंगे

हम अपनी गजल गर सुनाने लगेंगे
तुम्हें हम भी पागल दिवाने लगेंगे

मुहब्बत के किस्से जवानी की बातें
समझने में तुमको जमाने लगेंगे

अगर कब्र से लौट कर आ गया तो
ये सब फिर से आंसू बहाने लगेंगे

जो ईमान अपना संम्भाले हुए है
तुम्हें उनके कपड़े पुराने लगेंगे

चलो मयकदे में वहीं बात होगी
यहां आप हम पर चिल्लाने लगेंगे

राजीव कुमार

ये लो मेरी बधाई बिटिया

मेरे अजीज दोस्त Panin Kaushal की सूपुत्री के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर

ये लो मेरी बधाई बिटिया
खाती रहो मिठाई बिटिया

खुशियां सारी घर में आई
जब से घर में आई बिटिया

धन दोलत की परवाह कैसी
घर की लक्ष्मी माई बिटीया

मम्मी के ही जैसी बिल्कुल
माखन और मलाई बिटीया

पापा का ओहदा है ऊंचा
पर उनकी ऊचाई बिटीया

पापा तो बस तन्ख्वा लाये
घर में बरकत लाई बिटीया

देर से घर पापा आयें तो
करती खूब लड़ाई बिटीया

चाचू की चमची है लेकिन
दादू की है ताई बिटिया

बेटे भी अच्छे हैं लेकिन
बेटो की अच्छाई बिटिया

राजीव कुमार

जैसा सोचा था वैसा निकला है

गजल-------शुक्रिया

जैसा सोचा था वैसा निकला है
आज का दिन भी अच्छा निकला है

हर कोई लम्बी लाईनो में था।
हर किसी का पसीना निकला है।

उसके खाते में है खुदा शायद
जिसके खाते से पैसा निकला है

इक तरफ फैसला तेरा और हम
देख किसका दिवाला निकला है

सबका रुपया सफेद है राजीव
तेरा सिक्का ही काला निकला है

राजीव कुमार

आज कल के तमाम मुद्दों पर

आज कल के तमाम मुद्दों पर
राय अपनी है आम मुद्दों  पर

वो जो दावे से सच दिखाते थे
सारे चुप है गुलाम मुद्दों पर

कैमरे बोलने लगे है अब
मिल रहा है ईनाम मुद्दों पर

जाने जम्हूरियत का क्या होगा
अब तो हावी है नाम मुद्दों पर

किससे उम्मीद कर रहे हो मियां
कौन करता है काम मुद्दों पर

राजीव कुमार

अक्श हूँ या के आईना हूं

अभी अभी एक गजल

अक्श हूँ या के आईना हूं मैं
क्या बताउं के क्या बला हूं मैं

मेरे लहजे को छोड़ीये साहब
दोस्त कहते हैं सरफिरा हूं मै ।

मेरी हद क्या है क्या कहूं तुझसे।
तु है सरहद तो फिर हवा हूँ मैं

ए खुदा तु तो जानता है सब
कितना अच्छा हूं और बुरा हूं मैं

रहनुमाओं को है गलत फहमी
उनके दम पर ही जी रहा हूं मैं

इश्क और शायरी के झगड़े में
आज कल यार फस गया हूं मैं

आप से मिल के ये समझ आया
आप ही के लिये बना हूँ मै।

मेरे शेरों में जिक्र है जिनका
उनकी खातिर भी इक नशा हूं मै

दोस्तो बन्द कर लो ओफिस अब
शाम के वक्त मैकदा हूँ मैं

इससे पहले कि याद तुम आओ
जाम दो चार पी गया हूं मैं

राजीव कुमार

किस बात का है गुस्सा किस बात की लड़ाई

किस बात का है गुस्सा किस बात की लड़ाई
किस्मत ये मेरी है कि तुम जिन्दगी में आई

दो पल जो मांग बैठा तुम से मेरी खता थी
इस बात पर सजा दो दूंगा न मै दुहाई

मै कल भी था तुम्हारा मै अब भी हूं तुम्हारा
तन्हा हुआ मैं  जब जब  ये बात याद आई

राजीव

Thursday, June 9, 2016

मुहब्बत है तिरे दिल मे इसे तू मत छुपाया कर

मुहब्बत है तिरे दिल मे इसे तू मत छुपाया कर
लबो से गर नहीं मुमकिन तो आंखो से बताया कर
हया से सर झुका कर फिर जरा सा मुस्कुराया कर
बहुत मीठा जहर है ये इसे मुझको पिलाया कर
मेरी आखों मे कोई ख्वाब बन के रहने वाली सुन
मुझे भी अपने ख्वाबो मे कभी तू भी बुलाया कर
राजीव कुमार

वो तमाम दुनिया का है मगर मैं जताऊँ हक़ तो मिरा नहीं ।

वो तमाम दुनिया का है मगर मैं जताऊँ हक़ तो मिरा नहीं ।
उसे कैसे अपना खुदा कहूं, मुझे अब तलक जो मिला नहीं।
इस दौर में किसी शक्स ने कभी इश्क मर के जिया नहीं
कोई लैला जैसी हुई नहीं कोई क़ैस जैसा बना नहीं
ये अजीब किस्सा ए जिस्त है कि हर इक कदम पे हैं ठोकरें।
मेरा हम सफर यही सोच कर कभी साथ मेरे  चला नहीं ।
कभी दरिया बन के उतर गया कभी सहरा जैसे ठहर गया।
तेरा ख्वाब पलकों से जाने जां कभी अश्क बन के गिरा नहीं
जहां आंधियों के थे घर वहीं मैने अपना घर भी बना लिया।
तेरी याद घर से लिपट गयी मेरे घर से कुछ भी उड़ा नहीं
ये सवाल फिक्र का है नहीं ये तो मसअला है ख्याल का ।
तेरी जिन्दगी की गजल हुई मेरा शेर अब भी हुआ नहीं
राजीव कुमार
क़ैस- मजनू
जिस्त- जीवन

मुश्किल से मुश्किल देखा है

मुश्किल से मुश्किल देखा है
रस्ता और मंजिल देखा है
पत्थर की दुनिया में हमने
शीशे जैसा दिल देखा है
राजीव

जिस्म से जान लूट लेगा क्या ।

जिस्म से जान लूट लेगा क्या ।
सारा सामान लूट लेगा क्या ।
तू नशा करके अपने बच्चों की ।
यार मुस्कान लूट लेगा क्या ।
ये जमीं आसमां हवा पानी।
सबको इन्सान लूट लेगा क्या।
मौत के बाद घर फरिश्तों के।
कोई सुल्तान लूट लेगा क्या ।
करके मिट्टी से तू अलग मुझको।
मेरी पहचान लूट लेगा क्या ।
पहले जापान लूट आया था ।
अबके तेहरान लूट लेगा क्या।
राजीव कुमार

मुहब्बत बे असर कर दी गयी है

मुहब्बत बे असर कर दी गयी है
ये दुनियां इस कदर कर दी गयी है
अमीरों की खुशी के ही लिये बस।
गरीबी दर ब दर कर दी गयी है ।
जहां तक बात है सच झूठ की तो
इधर की सब उधर कर दी गयी है
कभी आवारगी थी जिन्दगी अब।
महज दफ्तर से घर कर दी गयी है
वफा, ईमान, चाहत, सादगी की
हर इक राह पुरखतर कर दी गयी है
मजा आने लगा है अब सफर का
वो मेरी हम सफर कर दी गयी है
राजीव कुमार

हमें इश्क करना सिखा तो न दो गे

हमें इश्क करना सिखा तो न दो गे
हसा कर कहीं फिर रुला तो न दोगे
कहो दिल से पहले सजा तो न दोगे
मुझे जिन्दगी की दुआ तो न दोगे
मै इक राज अपना बताता हू लेकिन
सरे आम सबको बता तो न दोगे
जमी आसमां चांद तारों से आगे
हमें आप पैदल चला तो न दोगे
मुझे छोड़ कर आज तो जा रहे हो
कल आने का वादा भुला तो न दोगे
मुहब्बत नहीं तो अदावत ही रक्खो
ये रिश्ते कहीं तुम मिटा तो न दोगे
मेरा नाम बदनाम है शायरों में ।
मुझे नाम कोई नया तो न दोगे
राजीव कुमार

हम अगर आप को भुला देंगे


हम अगर आप को भुला देंगे
उम्र भर खुद को ही सजा देंगे

जानो दिल तुमको दिल रुबा देंगे
हम भी पत्थर को आइना देंगे

दर्द जब हद से गुजर जायेगा
हम भी थोड़ा सा मुस्कुरा देंगे

ऐसा लगता है ये सियासी लोग
मिल के इस मुल्क को मिटा देंगे

तो चलो मैकदे में चलते है ।
शायरों से तुम्हे मिला देंगे ।
राजीव

निकल जायेगी राहे पुर खतर से

मतला
निकल जायेगी राहे पुर खतर से
मुहब्बत मिट नहीं पायेगी डर से
मिटा दे गम जो मेरे दिल जिगर से
मुझे वाकिफ करा दो उस जहर से
मेरा घर है मेरी बेटी से रौशन ।
मूझे लेना है क्या शम्सो कमर से।
सराफत शर्म सच और साफगोई
कहां रक्खे उठा कर अपने सर से
लिपट कर रोने वाले भाग लेंगे 
अगर मै उठ गया अपनी कबर से
राजीव कुमार

हुक्मरानों अब तो जा कर देख लो

हुक्मरानों अब तो जा कर देख लो
मुल्क में सूखे का मंजर देख लो
खाक होती जा रहीं हैं हसरतें
हम किसानों का मुकद्दर देख लो
रेत ही बाकी बची है हर जगह
हैं कहां किस ओर पुष्कर देख लो
आदमी से आदमी का वास्ता ।
क्या बतायें जाओ अजगर देख लो
सरहदो में बंट गयी सारी जमीं
रह गया है सिर्फ अम्बर देख लो
सारी दुनिया आप की हो जायेगी
आप नक्से से लिपटकर देख लो
राजीव कुमार
जलाशय -पुष्कर

सिर्फ मुझको ही सताने पे उतारू है अब

बस यूँ ही
सिर्फ मुझको ही सताने पे उतारू है अब
तू भी क्या इश्क निभाने पे उतारू है अब
खून आखो से बहाता था मेरी खातिर जो ।
वो मिरा खून बहाने पे उतारू है अब ॥
एक सहरा कभी दरिया का नहीं हो सकता।
तू भी किस किस को मिलाने पे उतारू है अब।
मैं जमाने से लड़ूं और जमाना मुझसे
दिल किसी को तो मिटाने पे उतारू है अब।
मेरे सपनों को हकीकत तो बना दे मौला।
तू तो मुझको ही भूलाने पे उतारू है अब।
राजीव कुमार
जिन्हें समझे थे हम झगड़ो पे मिट्टी डालने वाले।
वही सब बन गये हैं अब डकैती डालने वाले ।
बताओ क्या कहें हम मुल्क के उन रहनुमाओ से।
वही सारे तो हैं जख्मो पे मिर्ची डालने वाले
राजीव कुमार

सिर्फ आजाद होने का सबक मांग रहा है

सिर्फ आजाद होने का सबक मांग रहा है
वो गुनहगार नहीं जो हक मांग रहा है।
दुश्मनी देखो अंधेरों की उसी से है जो
इन अंधेरों में चिरागों से चमक मांग रहा है
आम इन्सान था औकात में रहता लेकिन ।
तू हूकूमत से हूकूमत की ठसक मांग रहा है।
सच कहुं गर मैं हकीकत का हवाला दे कर
हुक्मरां अब तो यहां जान तलक मांग रहा है
हम किसानों को मियां थोङी तो राहत दे दो।
आप से कौन सितारा ए फलक मांग रहा है।
राजीव कुमार

किसानों को फसलों की कीमत दिला दो


किसानों को फसलों की कीमत दिला दो
इन्हें आप मत अब सगुफा नया दो
न अधिया न पौवा न देशी न इंग्लिस
इलेक्सन खतम हो गया हे बता दो
बहुत देश भक्ती दिखाई हे तुमने
कहां कला घन है ये अब तो दिखा दो
पुराने दिनों को भले कोस लेना ।
मगर अच्छे दिन का कोई तो पता दो
राजीव कुमार

अगर झूठ बोला हे तो फिर सजा दो

अगर झूठ बोला हे तो फिर सजा दो
मुहब्बत मिटा दो या हमको मिटा दो
अरे आशुंओं मेरी इज्जत बचा दो
कहा है किसी ने मुझे मुस्कुरा दो
न हो जाये जाहिर कहीं गम हमारा
जरा राजे दिल आज तुम ही छुपा दो
हकीकत से तुम चाहे नजरें चुरा लो
मगर आईने की खता तो बता दो
ये जीना हे या खुदकुशी हे खुदाया
गरीबों की खातिर ये हे क्या बता दो
न दौलत न सोहरत न हीरे न मोती
अगर दे शको तो हमें भी दुआ दो
मजेदार है जिन्दगी का सफर भी।
नयी मंजिलों को नया रास्ता दो
Rajeev Kumar

आपने रोटी उठाई फैंक दी

आपने रोटी उठाई फैंक दी
मेरी दिनभर की कमाई फैक दी।
इस कुएं में झांक कर तो देखिये
जिसमें हमने हर भलाई फैंक दी
दर्द में कुछ इस तरह आया मजा।
हमने दर्दों की दवाई फेंक दी।
इस सियासत ने हमारे शह्र पर
आज फिर माचिस जलाई फैंक दी
जात मजहब झूठ धोखा दुश्मनी ।
मयकदे ने हर बुराई फैंक दी।
राजीव कुमार

झूठ का सब्ज बाग दिखता है


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झूठ का सब्ज बाग दिखता है
अब अंधेरा चिराग दिखता है
दौरे हाजिर में आप देखो तो
सबके दामन में दाग दिखता हे
हुक्मारानों को इस सियासत में
बस गुणा और भाग दिखता हे
इक जमाने से दोस्त था लेकिन।
अब वही शक्स नाग दिखता है
हुस्न शोला है गर तुम्हारा तो ।
दिल हमारा भी आग दिखता है
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राजीव कुमार

हुस्न वालों से दिल्लगी छोङो।

हुस्न वालों से दिल्लगी छोङो।
अब मियां ऐसी शायरी छोङो।
कौन हर काम ठीक करता है।
आप भी कुछ न कुछ कमी छोङो।
शाम के पांच बज गये हैं क्या ।
अब तो सरकारी नौकरी छोङो।
है बूरी चीज ये शराब तो फिर ।
सबसे पहले इसे तुम्ही छोङो।
पी के हर रोज सब ये कहते है
यारों कल से ये लत बुरी छोङो ।
मैं हरिद्वार में ही रहता हुं ।
मिलना चाहो तो जिन्दगी छोङों ।
राजीव कुमार

Saturday, January 9, 2016

ये जो इनकार है इकरार भी हो सकता था।

दिल्ली एम्स से बैठे बैठे
ये जो इनकार है इकरार भी हो सकता था।
मुझसे मिलता तो तुझे प्यार भी हो सकता था।
जिन्दगी के सफर में साथ तेरे जाने को ।
तू बुलाता तो मैं तैयार भी हो सकता था ।
आज जिन्दादिली है दिल के जर्रे जर्रे में।
इश्क करके तो ये बेकार भी हो सकता था।
और कुछ दिन अगर ईमान लिये चलता तो ।
यार जीना मेरा दुष्वार भी हो सकता था।
दुश्मनी छोङ के इक बार तो कहता मुझसे।
तेरी खातिर मैं तेरा यार भी हो सकता था।
मेरे बस्ते में किताबें जो न रखते बाबा।
तो मेरे हाथ में हथियार भी हो सकता था।
राजीव कुमार

हर हाल में हैं खुश हमें हर हाल मुबारक

हर हाल में हैं खुश हमें हर हाल मुबारक
तुम कहते रहो चाहे नया साल मुबारक
जन्नत का मजा क्या हे ये तो आप ही समझो।
हमको तो बस हमारा नैनीताल मुबारक ।
खुद्दार मुफलिशों ने हुकूमत से कह दिया ।
हो आप को ही आप का भौकाल मुबारक।
तुम सामने बैठी रहो आंखों के और मैं।
देखा करुं ये हुस्ने बेमिसाल मुबारक ।
मेरा हर एक शेर मेरे साथ रहेगा ।
तुमको ही ये दौलत ये जर ओ माल मुबारक ।
राजीव कुमार

हुस्न रंगत जुल्फ शोखी नाज ओ नखरा देखकर

हुस्न रंगत जुल्फ शोखी नाज ओ नखरा देखकर।
छू के देखूं दिल में रख लूं तुझको चाहा देखकर।


रौशनी अब रात भर छत पर ही रहती हे मिरे।
चांद रुक जाता है हर शब तेरा चेहरा देखकर।

सबनमी होती है उस दिन की सुबह ए जानेजा
जागता हुं नीद से जब ख्वाब तेरा देखकर

खूब रोती हैं लिपट कर हमसे अब तनहाईयां।
थक गयीं हैं ये बेचारी तेरा रस्ता देखकर

मौत भी आती नहीं और जिन्दगी मत पूछना।
क्या करोगे रोज जीता रोज मरता देखकर

राजीव कुमार

मुलाकातों का ऐसा सिलसिला हो।

मुलाकातों का ऐसा सिलसिला हो।
के मुश्किल से भी मुश्किल फैसला हो।
हिमायत दुश्मनी की करने वाला ।
न मैं , न तू , न कोई दूसरा हो
बहुत खूं बह चुका है दोनो जानिब ।
कोई रिस्ता भी अब तो प्यार का हो
मिटा कर अब जहन से तल्खियों को
रकीबों से चलो अब राबिता हो।
सियासत छोङ कर मैं आ तो जाउं
मगर तुझमें भी ऐसा हौसला हो।
राजीव कुमार

कोई वादा अपना आप निभाओ तो।

कोई वादा अपना आप निभाओ तो।
कब आयेगा काळा धन बतलाओ तो
बन जाना भगवान किसानों के चाचा।
दाम फसल का ढेङ गुना दिलवाओ तो।
ना खाउंगा और ना ही खाने दुंगा ।
कितनी झूठी बात है ये समझाओ तो।
भाषण सुनने हम भी लंदन आयेंगे।
भाङे पर हमको भी ले कर जाओ तो।
राम लला के नाम पे धन्धा बहुत हुआ ।
राम लला के मंदिर को बनवाओ तो।
टू जी थ्री जी जितना तुम चिल्लाते थे
व्यापम व्यापम उतना ही चिल्लाओ तो
अच्छी अच्छी बात चलो अब करते हैं।
अच्छे अच्छे जुमले आप सुनाओ तो।
राजीव कुमार

इश्क जब सर सवार होता है

फिलबदीह 198
इश्क जब सर सवार होता है
तब कहां इन्तेजार होता हे।
प्यार हमको भी यार होता है
हर किसी को बुखार होता है
जहनों दिल में करार होता है।
जब ख्यालों में यार होता है
इन दवाओं से कुछ नहीं होता।
जब कभी दिल बीमार होता है।
तेरी नजरों की जेल में जा कर
कौन कैदी फरार होता हे ।
आप के दम से हो गया बाईस ।
वरना दो और दो चार होता है
इस जहां में ईमान वालो का।
हल्का फुल्का पगार होता है।
डांट फटकार तो हैं बाबा के।
मां का गुस्सा दूलार होता है।
राजीव कुमार

मेरी हिम्मत गवाही दे रही है

ताजा गजल
मेरी हिम्मत गवाही दे रही है
तेरी ताकत दुहाई दे रही हे।
बुजूर्गों की नसीहत जिन्दगी में।
मुसलसल रहनुमाई दे रही है ।
मुहब्बत करने वालों को मुहब्बत
जमाने से लङाई दे रही है।
हुआ जब दर्द तो मां याद आई।
लगा मुझको दवाई दे रही है।
तुम्हारे वास्ते मिट्टी है लेकिन
मूझे तो मां दिखाई दे रही है
मेरी बेटी मुझे पापा बुलाकर
मुझे जैसे मिठाई दे रही है
ये कैसे रास्ते है इस शहर के।
नहीं मंजिल दिखाई दे रही है
शरीफों को मियां अब तो सराफत।
बहुत मोटी कमाई दे रही है
सुनो तूफान आयेगा कहीं पर ।
मुझे आहट सुनाई दे रही हे।
राजीव कुमार

पूछती है हूकूमत से ये मुफलिसी

पूछती है हूकूमत से ये मुफलिसी
हमसे क्युं दूर है अब हमारी खुशी ।
आज दुनिया में ईमान मत पूछीये।
आज कल नाम इसका तो है बुजदिली।
तिश्नगी जिसकी दौलत की मिटती नहीं
आज का आदमी है वही आदमी।
बाप का रुत्बा कुछ कम नहीं है मगर
मां न होती तो होती नहीं जिन्दगी ।
इल्म के सब चिरागों को जिन्दा करो।
ए खुदा अब हमें चाहिये रौशनी ।
राजीव कुमार

जान भी आप की रूह भी आप की ।

जान भी आप की रूह भी आप की ।
आपकी की ही तो है अब मेरी जिन्दगी।
अच्छा लगता नहीं था हमें कोई गम
मिल न पायी थी जबतक गमे आशिकी ।
रश्क हो चांद को आप से क्युं नहीं ।
आप के सामने कुछ नहीं चादनी ।
राजीव

तू मेरे सामने चली आयी ।

तू मेरे सामने चली आयी ।
मैने सोचा कि जिन्दगी आयी।
पहले आई थी इस जमीं पर तू
फिर तेरे बाद शायरी आयी ।
ऐसा लगता है इन निगांहों से।
सारी दुनियां को मयकशी आयी ।
तू न आयी थी रात को लेकिन
तेरी यादों की रौशनी आयी ।
देख कर तेरे इन लबों को ही।
जैसे फूलों को ताजगी आयी।
छोङ कर जबसे तुम गयी जाना।
घर मेरे फिर नहीं खुशी आयी ।
राजीव कुमार

अपनी शर्तों पे बात करता है

अपनी शर्तों पे बात करता है
फिर भी हर बात से मुकरता है।
उसको दुनिया कुछ सउर नहीं।
इश्क करता है और डरता है
हर कोई अपनी अपनी धुन में हे।
हर कोई अपनी अपनी करता है
खूं उतर जाता है निगाहों में
जब कोई तंज तुझपे करता है
मेरे भीतर भी एक रावण था
मेरे भीतर ही अब भी रहता है
इक हमारे लिये ही जाने क्यूं
तल्ख तेवर जमाना रखता है
मेरी आंखों इक तेरा चेहरा
रात भर मेरे साथ रहता है
किससे फरियाद हम करें बोलो
हम गरीबों की कौन सुनता है
अब चिरागों का कोई काम नहीं।
अब दिया मेरे दिल में जलता है
मौत का एक दिन मुकर्रर है।
क्यु कोई रोज रोज मरता है
राजीव कुमार

तुमने जो शौक से उङाया था ।

काव्योदय ग्रुप की फिलबदीह से नीकळे शेर
तुमने जो शौक से उङाया था ।
हमने मेहनत से वो कमाया था।
मेरे बच्चों वो दिन भी याद रहे।
हमने गुर्बत में जो बिताया था।
इश्क वैसे तो बुरी बात नहीं।
फिर भी हमने इसे छुपाया था
तू न आया मगर तेरा साया
दूर तक साथ मेरे आया था
होश की खा रहा है गोली वो।
जिसने शिद्दत को आजमाया था
मयकदा मुझ तलक नहीं आया।
उसने मुझको मगर बुलाया था
चाक किसका है गिरेबान यहां ।
दाग दामन पे किसके आया था।
याद अब तक हे वो हसीं मंजर।
हमने जो साथ में बिताया था।
राजीव कुमार

इश्क वालों की हकीकत देखना ।

इश्क वालों की हकीकत देखना ।
दिल की दुनिया में तिजारत देखना।
मैं मिरे हालात से वाकिफ ही हुं ।
तू मगर अपनी तबियत देखना ।
बोलते है आप सच इस दौर में ।
आप को होगी मुसीबत देखना।
कत्ल की साजिश में शामिल था वही ।
कर रहा हैं जो हूकूमत देखना।
रात भर जगती हैं आंखें आप की ।
अपनी आखों पर अजीयत देखना।
जेब में वैसे तो अपने कुछ नहीं ।
पर कभी इस दिल की दौलत देखना।
में तेरे काबिल न था ये सच नहीं।
तू कभी अपनी हकीकत देखना।
अच्छा तो फिर शुक्रिया चलता हुं मैं।
हो गया हे वक्ते रुख्सत देखना ।
अजीयत -- यातना
राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...