Thursday, December 15, 2016

अदब की बज्म को मिसरा नया दूं

फिलबदीह गजल कहने की कोशिश बज्म ए अदब ग्रुप पर ---------------- देखियेगा

अदब की बज्म को मिसरा नया दूं
इजाजत हो तो मैं मतला सुना दूं

दिलों के बीच की दूरी मिटा दूं।
मोहब्बत मैं जमाने को सिखा दूं

तजुर्बा दिल्लगी से टूटने तक
मोहब्बत करने वालों को बता दूं

मुझे मिल ही नहीं पाया जो अब तक
तो मै कैसे तुझे  उसका पता दूं ।

हकीकत में न जाने कब दिखेगे
तूझे ख्वाबों में अच्छे दिन दिखा दूं

लगाने वालों मुझको लाईनों में।
तुम्हे भी एक दिन ऐसी सजा दूं

तुम्हारी प्यास बढती जा रही है
लहू क्या मैं तुम्हे अपना पिला दूं

सियासत आ गयी फिर से अदब में ।
कहो मैं खुद को इसकी क्या सजा दूं

खुदाया गर मिले एजाज तेरा
मैं सहरा को भी इक दरिया बना दूं

कफस में जिस्म के हूं कैद अब तक
तूझे ए जिन्दगी मैं और क्या दूं

राजीव कुमार

No comments:

Post a Comment

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...