कुछ नया कहने की कोशिश
जब से कोलेज तुम आ गई दिलरुबा
तब से दिल बन गया जुर्म का सरगना
आशिकों के लिये तेरी हर इक अदा।
जैसे कश्मीर में लश्कर ए तय्यबा।
चांद भी सोचता रह गया क्या कहूं ।
देख कर बस तुझे देखता रह गया।
जिक्र तेरा गजल में किया जब कभी
हर किसी ने कहा मरहबा मरहबा।
इश्क सर पर मिरे चढ़ गया क्या करूं।
दोस्तो अब मुझे ले चलो आगरा
इश्क सबके लिये है उसे छोड़ कर
जो भी उन्नीस से कम का है छोकरा
राजीव कुमार
जब से कोलेज तुम आ गई दिलरुबा
तब से दिल बन गया जुर्म का सरगना
आशिकों के लिये तेरी हर इक अदा।
जैसे कश्मीर में लश्कर ए तय्यबा।
चांद भी सोचता रह गया क्या कहूं ।
देख कर बस तुझे देखता रह गया।
जिक्र तेरा गजल में किया जब कभी
हर किसी ने कहा मरहबा मरहबा।
इश्क सर पर मिरे चढ़ गया क्या करूं।
दोस्तो अब मुझे ले चलो आगरा
इश्क सबके लिये है उसे छोड़ कर
जो भी उन्नीस से कम का है छोकरा
राजीव कुमार
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