अभी अभी एक गजल
अक्श हूँ या के आईना हूं मैं
क्या बताउं के क्या बला हूं मैं
मेरे लहजे को छोड़ीये साहब
दोस्त कहते हैं सरफिरा हूं मै ।
मेरी हद क्या है क्या कहूं तुझसे।
तु है सरहद तो फिर हवा हूँ मैं
ए खुदा तु तो जानता है सब
कितना अच्छा हूं और बुरा हूं मैं
रहनुमाओं को है गलत फहमी
उनके दम पर ही जी रहा हूं मैं
इश्क और शायरी के झगड़े में
आज कल यार फस गया हूं मैं
आप से मिल के ये समझ आया
आप ही के लिये बना हूँ मै।
मेरे शेरों में जिक्र है जिनका
उनकी खातिर भी इक नशा हूं मै
दोस्तो बन्द कर लो ओफिस अब
शाम के वक्त मैकदा हूँ मैं
इससे पहले कि याद तुम आओ
जाम दो चार पी गया हूं मैं
राजीव कुमार
अक्श हूँ या के आईना हूं मैं
क्या बताउं के क्या बला हूं मैं
मेरे लहजे को छोड़ीये साहब
दोस्त कहते हैं सरफिरा हूं मै ।
मेरी हद क्या है क्या कहूं तुझसे।
तु है सरहद तो फिर हवा हूँ मैं
ए खुदा तु तो जानता है सब
कितना अच्छा हूं और बुरा हूं मैं
रहनुमाओं को है गलत फहमी
उनके दम पर ही जी रहा हूं मैं
इश्क और शायरी के झगड़े में
आज कल यार फस गया हूं मैं
आप से मिल के ये समझ आया
आप ही के लिये बना हूँ मै।
मेरे शेरों में जिक्र है जिनका
उनकी खातिर भी इक नशा हूं मै
दोस्तो बन्द कर लो ओफिस अब
शाम के वक्त मैकदा हूँ मैं
इससे पहले कि याद तुम आओ
जाम दो चार पी गया हूं मैं
राजीव कुमार
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