Thursday, December 15, 2016

खुद के भीतर के वीरानों, में इन्सां जो भटका है

खुद के भीतर के वीरानों, में इन्सां यूं  भटका है
जैसी बस्ती कस्बा नगरी, पैदल पैदल फिरता है।

दुनिया भर के दर्दों को भी, है उससे हमदर्दी ही।
अपने पांवों के जख्मों पर, मन ही मन जो हँसता है।

अरमानों की सूली पर जो, ज़िन्दा लटका है उसके।
सीने के भीतर इक पत्थर, धक-धक धक-धक करता है।

फूलों कांटों जुगनू रातों,  और बहारों की आंखों में।
अक्श तुम्हारा सागर बन के, छलका छलका रहता है।

सच्चा झूठा आधा पूरा ,ख्वाब हकीकत  कौन है तू ।
मेरे भीतर तू है या फिर ,मुझको बाहर रक्खा है।

राजीव कुमार

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