Thursday, June 9, 2016

वो तमाम दुनिया का है मगर मैं जताऊँ हक़ तो मिरा नहीं ।

वो तमाम दुनिया का है मगर मैं जताऊँ हक़ तो मिरा नहीं ।
उसे कैसे अपना खुदा कहूं, मुझे अब तलक जो मिला नहीं।
इस दौर में किसी शक्स ने कभी इश्क मर के जिया नहीं
कोई लैला जैसी हुई नहीं कोई क़ैस जैसा बना नहीं
ये अजीब किस्सा ए जिस्त है कि हर इक कदम पे हैं ठोकरें।
मेरा हम सफर यही सोच कर कभी साथ मेरे  चला नहीं ।
कभी दरिया बन के उतर गया कभी सहरा जैसे ठहर गया।
तेरा ख्वाब पलकों से जाने जां कभी अश्क बन के गिरा नहीं
जहां आंधियों के थे घर वहीं मैने अपना घर भी बना लिया।
तेरी याद घर से लिपट गयी मेरे घर से कुछ भी उड़ा नहीं
ये सवाल फिक्र का है नहीं ये तो मसअला है ख्याल का ।
तेरी जिन्दगी की गजल हुई मेरा शेर अब भी हुआ नहीं
राजीव कुमार
क़ैस- मजनू
जिस्त- जीवन

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