Thursday, December 15, 2016

दश्ते उल्फत में गया मैं तो मिला कुछ भी नहीं।

ताजा गजल

दश्ते उल्फत में गया मैं तो मिला कुछ भी नहीं।
तेरी महफिल में तेरा सब हैं मिरा कुछ भी नहीं

दर्द देने को हर इक शक्स है तैयार यहां
ऐसी दुनिया में बुरा सब हैं भला कुछ भी नहीं

ख्वाब मेरे मूझे सोने भी नहीं देते हैं ।
रात सोया था कि जागा था पता कुछ भी  नहीं

जहनो दिल में है तूही और तेरी यादें हैं ।
गौर से देख मिरा मुझमें बचा कुछ भी नहीं

ये भी सच है कि खुशी हर किसी की हसरत है
ये भी सच है कि खुशी गम के बिना कुछ भी नहीं

गर जुदा हैं तो जुदाई का लुत्फ ले तू भी ।
रोज मिलने में बिछड़ने में मजा कुछ भी नहीं।

राजीव कुमार

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