Tuesday, December 31, 2013

सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं , स्वस्थ रहें मस्त रहें उन्नति के मार्ग पर सदैव अग्रसर रहें .............. happy new year


सभी मित्रों को नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं , स्वस्थ रहें मस्त रहें उन्नति के मार्ग पर सदैव अग्रसर रहें .............. happy new year 

जो सर्दी हो दिसम्बर की दुपहरी खास होती है,
अगर तारीख हो पहली जनवरी खास होती है /

हमारी जिंदगी हर पल बुढ़ापे के ही जानिब है,
जवानी में बदन हर इक छरहरी खास होती है/

जुदाई भी मोहब्बत में जरुरी है मेरे यारों,
दिसम्बर से जुदा हो के जनवरी खास होती है/

तुम्हारे बिन नहीं ये जश्न मुझको ठीक लगता है,
यहाँ तुम ही नहीं होते जनवरी पास होती है 

हर इक तारीख की किस्मत बनाना अपने हाथों से ,
तभी हर इक जनवरी या फरवरी खास होती है/

राजीव कुमार

Thursday, December 26, 2013

मैं गीत लिखूं और तू गाए,

मैं गीत लिखूं और तू गाए,
शब्दों में मेरे तू ही आये/
इस राग-द्वेष  में जीने से ,
अच्छा है की मरना हो जाये/
दिल लेना देना कर लें हम  ,
दिल का नज़राना हो जाये

कुछ सुनना सुनाना हो जाये
कुछ कहना बताना हो जाये/

ले मैँ भी तुझसे हार गया ,
पर बाजी भी मैँ मार गया ,
तू मुझे हराने आया था /
दिल हार के तू भी यार गया ,
हर बार तेरे तक जाने का
हर लफ्ज बहाना हो जाये/

मैं तेरा ठिकाना हो जाऊं/
तू मेरा ठिकाना हो जाये/

जो बीत गयी उन बातों से
दुःख दर्द भरे ज़ज्बातों से
नफरत की अँधेरी रातों से
तू भी अंजाना  हो जाये/
होते होते ऐ यार मेरे ,
ये इश्क़ पुराना हो जाये/,

मैं तेरा दीवाना हो जाऊं
तू मेरा दीवाना हो जाये/

जो बात नहीं की थी अब तक
चल वो भी हम मिल यार करें
जीना है तो चल संग जियें
हर ढंग निराला हो जाये
लड़ ले चल हम इस दुनिया से,
कुछ नाम कमाना हो जाये/

कुछ भी कर जाना हो जाये/
तुझ पे मर जाना हो जाये/

मैं सोचता हूँ वादा कर लें
अब खुशियों से नाता कर लें
तू मुझमे है मैँ तुझमे हूँ ,
ये बात तराना हो जाये/
इस नए ज़माने में चल अब
इक  नया फ़साना हो जाये,

ये शमा सुहाना हो जाये/
तू यार पुराना हो जाये

राजीव कुमार 

Thursday, December 19, 2013

फूलों से तितली का प्यार पुराना है,

ज़ुल्म हमेशा हम पर ढाने आते है।
ख़्वाब तुम्हारे हमें सताने आते हैं ।

प्यार पुराना है फूलों से तितली का 
भौरे तो बस प्यास मिटाने आते हैं ।

गावं पुरानी यादों का  घर  मेरा है।
बाग बगीचे याद दिलाने आते हैं।

पत्थर के जंगल से दिखते शहरों में,
छोङ के अपने गांव को क्युंकर आते हैं।

चिंता से क्या क्या खो देते देखा है,
हम तो बस अहसास कराने आते हैं,

जितना करते हैं उतना ही पाते हैं,
दुनिया में हम सब ही आते जाते है /

राजीव कुमार

Wednesday, December 18, 2013

सूरज हो या चाँद इशारा करता है,

सूरज हो या चाँद इशारा करता है,
बेघर ही हर बार तो हारा करता है/

कपड़ो के अंदर, भला क्या बचता है,
खादी ही लोगों को मारा करता है/

दफ्तर दफतर फिरते फिरते जान गया,
डिग्री से ईमान भी गुजारा करता है/

दौलत कि चाहत में अब न जाने क्युं।
रिश्तों से इंसान किनारा करता है।

जाने वाले छोड़ हमेशा जाते है
प्रेम हमारा उन्हें पुकारा करता है

राजीव कुमार

Monday, December 16, 2013

अगर जो आप कहते हो वही आबो हवा है तो

*ग़ज़ल*

जो अपने हाल पर खुश हो तो क्यूँ बे नूर रहते हो।
कहो किस डर से तुम भी हर घड़ी रंजूर रहते हो।

वो जो अख़बार में है  गर उसे तुम मानते हो सच।
तो अपने मुल्क के  सच से  बहुत ही दूर रहते हो।

तरक्की क्यूँ  नहीं चल कर  हमारे  पास आती है।
मुझे डर  है यही तुम  सोच कर  मजबूर रहते हो।

यहाँ पर  मजहबी  सैलाब  में जब  लोग  मरते हैं।
कभी  रोका  है जा कर  या वहाँ  से  दूर रहते हो?

बहुत अच्छा हुनर है झूठ को सच की तरह कहना।
मगर जब सच हो कहना तो कहाँ काफूर रहते हो।

गरीबी ज़ख्म है इस मुल्क़ के सीने पे तो क्या तुम।
कभी  बनते  हो  मरहम  या सदा नासूर  रहते हो?

तुम्हारी  देशभक्ति  पर  भरोसा  कौन   कर  लेगा!!
नसल  के नाम  पर  तुम भी  नशे में  चूर  रहते  हो।

राजीव कुमार

रंजूर - दुखी
क़ाफूर- गायब

Saturday, December 14, 2013

खबर वालों के अख़बारों के पन्ने लाल दिखते हैं,

खबर वालों के अख़बारों में खबरी लाल लिखते हैं,
ये साहब बिकते हैं पहले तभी कुछ हाल लिखते हैं/

न जाने कैसे कैसे इस जहाँ में हैं बड़े शायर,
कभी ये हुस्न लिखते है किसी के गाल लिखते हैं/

गजल कि रूह का मतलब भला वो कैसे समझेंगे,
जो कत्ले आम कि खबरे यहाँ हर साल लिखते हैं/

यहाँ लिखना सियासत में वफादारी का सिम्बल है,
यहाँ टिकते वही हैं जो किसी का काल लिखते है,

गरीबी कि बीमारी का असर  है मुल्क पर  यारों,
दवा कि पर्चियों पे भी ये रोटी दाल लिखते हैं /

हमारी सभ्यता कि आज अस्मत लुट गयी शायद ,
यहाँ तो आज कल इंसान को भी मॉल लिखते हैं /

राजीव कुमार 

मेरे जवाब पर नया सवाल कैसे हो गया ,

मेरे  जवाब  पर  नया  सवाल  कैसे  हो  गया ,
जो बात हक़ की कर दी तो बवाल कैसे हो गया ?

मेरी  शिकायते  कहाँ  थी  आप  से  मेरे  हुज़ूर ,
मुझे  बताइये  मेरा  ये  हाल  कैसे  हो  गया ?

जो मेरे हिस्से का था वो  मुझी से लूट कर ,जनाब /
मुझे  ही दे दिया तो ये मिसाल कैसे हो गया ?

खुद अपने लफ्ज में ही अपनी पीठ थप थपा गए ,
बिना  सुने  किसी  की  ये  कमाल कैसे हो गया ?

सभी  रियासतों  के  सरपरस्त  आप  ही  रहे ,
बताइये न जीना फिर मुहाल  कैसे हो गया ?

अगर हो आप वो ही जैसा  कह  दिया था आप ने ,
तो  जातियों  के नाम पर उबाल  कैसे हो  गया ?

असल में आप भी शिकार हैं सियासतों के  वरना ,
गर्व  करते  करते  ये  मलाल  कैसे  हो  गया ?

ये  जिक्र ये  अहम् फिजूल लग रहा है आप का ,
हमे  नहीं  है  फ़िक्र  ये  ख्याल  कैसे हो गया ?

रहेगा  इंतज़ार  मुझको  आप  के  जवाब  का ,
सवाल दर  जवाब  पर  सवाल  कैसे  हो  गया ?

राजीव कुमार 

Friday, December 13, 2013

नज़र मिली नहीं कि इश्क़ का बुखार चढ़ गया,


नज़र मिली नहीं कि इश्क़ का बुखार चढ़ गया, कुछ ही दिनों के साथ में खुमार ये उतर गया/ नये लिबास ने अदब का कायदा बदल दिया, निगाह क्या करे कि जब बदन निगाह पर गया/ दिलों का साथ क्या है आज का बड़ा सवाल है, जो आज इसके साथ था वो उसका साथ कर गया/ मोहब्बतों की नथ भी पार्कों में है उतर गयी, मिटा के भूख जिस्म की हर एक शक्स घर गया ।

अजी ये प्यार है जनम जनम का किसने कह दिया, मिला ये ही सबक कि जबसे गावं से शहर गया/ नयी रवायतों के दौर में शाइर आज कल, किसी की आशिक़ी में बस तड़प तड़प के मर गया/
राजीव कुमार

Thursday, December 12, 2013

अहसासों कि इन बातों का


अहसासों कि इन बातों का 
अंदाजे बयां कुछ ऐसा हो,
कागज का समंदर हो,
उसमे स्याही भी मोती जैसा हो/

बिक जाता है ईमान यहाँ
चेहरे कि भी रंगत बिकती हो,
तेरे हुनर को कोई खरीद सके
ऐसा रुपया न पैसा हो/

लफ्जों कि महक भी इतनी हो '
हर लफ्ज फिजा का फूल लगे,
हर हर्फ़ का मंजर सबनम कि,
बूंदों के चमक के जैसा हो/

राजीव कुमार 

Thursday, December 5, 2013

असर है जो मोहोब्बत का निकल जाता है सीने से,


असर है जो मोहोब्बत का निकल जाता है सीने से,
ये वो कहते हैं जो रोजी कमाते हैं पसीने से /

अगर माशूक के आँखों से ही पीते सभी शायर,
खबर फिर ये नहीं आती मरे हैं लोग पीने से /

उछल कर चाँद छूने का जो दम भरते हैं उनका तो,
ये ही सच है कि कोठे पर भी ये जाते है जीने से /

सियासत का वफ़ा से हो न हो रिश्ता कोई तो है,
किसी का हाथ पकड़े और लगा कोई करीने से /

थे जब तक हम भी चाहत में हमें भी रश्क रहता था, 
शिकायत अब हुई है जा के इस पिछले महीने से/ 

राजीव कुमार

Wednesday, November 27, 2013

कभी तो बात कीजिये ,

कभी  तो  बात  कीजिये ,
हवा  का  रुख बदलने का ,
कटीले  रास्तों पे  साथ  साथ ,
मिल  के  चलने  का /
बहुत  चलें  हैं  नीद  में ,
रहे  हमेशा  भीड़  में ,
कि  वक़्त  आ  गया  है ,
इन  घरों से अब  निकलने  का /

अदब  से  गम  से  मान  से ,
हमी  मरे  हैं  जान  से /
हमारे  ही  लहू  से  हाथ ,
पोछते  वो  शान से /
कि  हमको भी  खबर  न  थी ,
हमारी  इक  डगर  न  थी ,
उठो  समय  नहीं  है  अब 
ये  भेड़  चाल  चलने  का /

जहर  ये  मजहबी  हमे  तो ,
आज  भी  डरा  रहा ,
वो  देख  लो  सड़क  पे ,
आम  आदमी  कराह  रहा /
हमारे  घर  में  घुस  रहे 
हमी  को   ही  जला  रहे ,
ये  आग  कह  रही  है  अब  
समय  है  बस  उबलने  का /

घडी  सदी  कि  आज  भी ,
वही  पे  है  रूकी  हुई /
अभी  भी  जातियों  में  है ,
ये  बस्तियां  बटी  हुई /
चलो  इन्हे  भी  जोड़  दें ,
पुरानी  रश्मे  तोड़  दें ,
रुकी  घड़ी  बदल  दें , की ,
समय  है  ये  बदलने  का /

नसल  को  नाड़ियों  से  अब 
निकाल  कर  के  फेक  दो ,
लहू  की  गर्मियों  से 
अपनी  धमिनियों  को  सेक  लो ,
कि  सांस न  हो  सर्द  से ,
ये  फासले  हैं  बर्फ  से /
समय  भी  आ  गया  है ,
अब  तो  बर्फ़  के  पिघलने  का /

कभी  तो  बात  कीजिये ,
हवा  का  रुख बदलने का ,
कभी  तो  बात  कीजिये ,
समय  को ही बदलने  का /
कभी  तो  बात  कीजिये ,
उबलने  का, उबलने  का /
कभी  तो  बात  कीजिये न ,
साथ  मिल  के  चलने  का /

राजीव कुमार

Monday, November 25, 2013

जलते लोग कौन हैं


बुलंदियों पे बैठे वो,
असल में लोग कौन हैं?
यहाँ जमी पे लेट कर,
सिसकते लोग कौन हैं?
सवाल है ये हक़ का तो,
जवाब फिर बताइये,
दमन कि आग में यहाँ पे,
जलते लोग कौन हैं ?

जो दाल रोटी के लिए,
अटकते हर दुकान में/
मुसीबतों में ही रहे ,
सदा वो इस  जहान  में /
उन्ही के हाथ से बनी,
हवेलियों में बैठ कर ,
उन्ही कि छातियों पे ये ,
टहलते लोग कौन हैं ?

जो खेत अपने सींचते,
लहू के कतरे कतरे से /
हमेशा ही डरे रहे,
हर एक जुल्म खतरे से/
ये ही जले हैं धुप में,
कभी बहे हैं बाढ़  में/
बताइये न भूख से,
मचलते लोग कौन हैं?

बड़े ही शान से हमारी
जेबें हैं जो काटते/
सियासी सरहदों में हैं,
दिलों को रोज बांटते/
उन्हें भी उनके बिल से अब,
निकाल कर बता दो तुम  /
दिखा दो, करके वायदे ,
बदलते लोग कौन हैं ?

राजीव कुमार

Friday, November 22, 2013

तजुर्बा मुझे अब ये होने लगा है ,

तजुर्बा मुझे अब ये होने  लगा है ,
कोई राह में कांटें बोने  लगा है  /

अंधेरों कि अब तो जरुरत नहीं है ,
कि रिस्ता  उजालो में खोने लगा है /

शहर  की चमक का तो मतलब यही है ,
सलीब-ऐ-जिश्म  इन्सा  ढोने लगा  है

क़यामत है क्या गौर कीजे  जारा सा,
वो भूखा सड़क पे जो सोने लगा  है /

वो माँ ही बताएगी ममता कि कीमत,
देहड़ी पे है  बच्चा रोने लगा  है /

यहाँ के मोहल्ले  का मजहब गजब है,
लहू से हर इक हाथ धोने लगा  है/

Rajeev Kumar

Wednesday, November 20, 2013

कभी तो ऐसी भी बात कर लो,


न जाने कब से तरस रहे हैं ,
ये आँख अब भी बरस रहे हैं ,
सिसकती सांसों कि आह सुन लो ,
कभी तो दिल कि भी चाह सुन लो /
मिले जरा सा शुकून जिसमे ,
कभी तो ऐसी भी बात कर लो,

मुझे  खुदा से कहाँ गिला है ,
वो मस्जिदों में कहाँ मिला है /
महोब्बतों के असर में है वो ,
तुम्हे जो देखु नजर में है वो /
जो मुझको मेरा खुदा मिला दे ,
कभी तो ऐसी भी बात कर लो/

है आरजू बस तुम्हारी मुझको ,
न दूर जाओ मेरी कसम है /
कि कब तलक दिल को हम बताएं ,
कहो न कैसे ये गम छुपाये /
हाँ उम्रभर का जो साथ दे दे ,
कभी तो ऐसी भी बात कर लो /

गजल भी आशिक़ बनी तुम्हारी ,
ये  इश्क़ भी है क्या एक खुमारी /
मेरी डगर तुम मेरी हो मंजिल ,
हो  नज्म मेरी, मेरी गजल  हो ,
जो रूह दे दे मेरी नजम को ,
कभी तो ऐसी भी  बात कर लो /

Rajeev kumar

Tuesday, November 19, 2013

बहुत शिकायत सुना है लेकिन ,



बहुत शिकायत सुना है लेकिन ,
बहुत सी बातें कही नहीं है /
नहीं मिला कुछ हमे मोहोब्बत ,
से बात ये भी सही नहीं है /

कि साथ जब तक रहे थे हम तुम,
थी बंदिशें और मिले थे हम तुम ,
नहीं थी हममे कोई मोहोब्बत ,
तो बात ये भी सही नहीं है/

वो हसता चेहरा, चमकती आँखे,
नहीं ख़त्म हो जो मीठी बातें,
तुम्हारा अक्सर यूँ मुस्कुराना,
हो गम कभी न उसे बताना,

हमे भी ऐसा हुनर बताया,
हाँ हस्ते रहना हमे सिखाया/ 
कहो अगर कि भुला दूँ तुमको,
तो बात ये भी सही नहीं है /

बहुत शिकायत सुना है लेकिन ,
बहुत सी बातें कही नहीं है /
नहीं मिला कुछ हमे मोहोब्बत ,
से बात ये भी सही नहीं है /

Rajeev Kumar

Sunday, October 27, 2013

आह आह कर रहे /

गज़ब के थे वो वायदे ,
हमारे हुक्मरान के /
जो कुर्शियों पे बैठे ,
आज वाह वाह कर रहे /
यहाँ मिजाज और है ,
यहाँ जवाब और है ,
अजी अवामं की सुनो ,
जो आह आह कर रहे /

कही पे भूख का जुलम,
शबाब पर है आ गया /
कहीं पे टुकड़ा रोटी का ,
वो सक्श आज पा गया /
यहीं कहीं पे चल रही है ,
भूखमरी की आंधियां /
ये बेरहम हवाएं है ,
जो सांय सांय कर रहे /

अजी हक-ओ-हुकुक की तो,
बाते खौफनाक है ,
घरों में बेटियों पे जुल्म /
और दर्दनाक है ,
कही पे उनकी चीख तो ,
कही घुटी आवाज है ,
जो कोख में पड़े हैं ,
आज हाय हाय कर रहे /

जो हाल एक सदी से था ,
वो हाल देखो आज है /
यहाँ तो प्यास खून की है ,
खंजरों पे नाज है /
कहीं पे क़त्ल के लिए ,
लगी है आज बोलियाँ /
ये मजहबी हैं गोलियां,
जो धांय धांय कर रहे /

अभी तलक तो जिस्म पर ,
दिए हुए ये घाव थे /
ये जिंदगी है जिंदगी में ,
धूप थे या छाव थे /
मगर यहाँ तो रूह भी ,
है मौत के कगार पर /
वो बच्चे उस दुकान पर ,
जो चाय चाय कर रहे /

सियासी मुफलिसी नहीं सहेंगे ,
अब ये बात हो /
हुकुमतो के सर पे ,
आम आदमी का हाथ हो /
न भूखमरी की आह हो ,
न बेबसी की वाह हो ,
न कोई हाय हाय हो ,
न कोई चाय चाय हो /

मेरी सुनो तो आप को ,
मेरा येही सुझाव हो /
सही जो है सही में बस ,
उसी का ही चुनाव हो /
चुनाव ही हमारा
सबसे तेज हथियार हो ,
उसी की धांय धांय हो ,
उसी की ठाय ठाय हो /


Rajeev Kumar

Thursday, October 24, 2013

सैलाब तुम्हारे अंदर है

कर  ख़त्म प्रतीक्षा की घड़ियों को
अपनी शक्ति पर नाज़  करो/
उठ  जाओ  अभी  आगाज  करो ,
पुरुषार्थ   तुम्हारे  अंदर  है ,
प्यासे हैं अगर प्यासे ही सही,
हो जाये अगर अन्याय कई/
मत  दरिया  की  दरकार  करो ,
सैलाब  तुम्हारे  अंदर  है ,

नफरत  की  दुनिया  है  ये  की
नफ़रत  हमने  ही  पाला  है ,
हम  ही तो हमेशा  मरते  है ,
जब  भी  मजहब  ने  मारा  है /
अपने ही हाथो से ना तुम ,
अपना ही लहू  बेकार  करो /
प्रतिकार  करो  प्रतिकार  करो ,
आवाज  तुम्हारे  अंदर  है /

कब  तक हम  बैठे , सोचेंगे ,
किस  ओर कदम  बढ़ाना  है /
किस जगह पे हमको रुकना है ,
किस  गली  से हमको जाना है/
उठ  जाओ  छोड़  प्रथाओं  को,
ये  वक़्त  ना  यूँ  बर्बाद  करो/
स्वीकार  करो  स्वीकार  करो/
किरदार  तुम्हारे  अंदर  है/

ये धरा  धरोहर मेरी है,
ये हिन्द हिमालय मेरा है/
क्या रोक सकेगा कोई मुझे,
ये सारा आलम मेरा है /
अपने जज्बे को अम्बर से ,
ऊँचा तुम मेरे यार करो/
अहसास करो अहसास करो,
विश्वास  तुम्हारे  अंदर  है /

राजीव कुमार

Monday, October 14, 2013

बेवफाई है क्या बताऊंगा/

जख्म  ऐ नासूर ना दिखाऊंगा ,
रोऊंगा उसको भी रुलाऊंगा /
जिस तरह उसने की वफ़ा मुझसे,
बेवफाई है क्या बताऊंगा/

अब तलक चुप रहा मैं गैरत में.
करके रुशवा नहीं वो हैरत में,
उशको उतना ही मैं सताउंगा,
बेवफाई है क्या बताऊंगा/

कितने अरसे से मैं न सोया था,
खवाबो में उसके में जो खोया था,
उसको भी रात भर जगाऊंगा/
बेवफाई है क्या बताऊंगा/

ख़त लिखे जो बड़े जज्बातों से,
दिल की सियाही, लहू से कांटो से/
उसके हर ख़त मैं जलाऊंगा ,
बेवफाई है क्या बताऊंगा/


Wednesday, September 25, 2013

मुनाशिब तो ये ही होता की खंजर खून न होता,

मुनाशिब तो ये ही होता की खंजर खून न होता,
हमारे मुल्क में ऐसा कोई जूनून  न  होता/

यहाँ की मजहबी गर्मी का मौसम ये नहीं कहता,
यहीं रहता हूँ तो फिर ये महिना जून न होता/

कई मस्जिद कई मंदिर अगर होते मोहल्ले में,
दीवारों  की मगर सुर्खी किसी का खून न होता/

हुकूमत के महकमे मे  सियासत मे यही होता,
यहाँ कानून के ऊपर कोई  नाखून  न होता/

अगर होता ये मुमकिन तो कोई मजबूर न होता,
कोई मजबूर हो जाता तो वो मजलूम न होता

राजीव कुमार  

Sunday, August 25, 2013

मेरी भी इतनी ही दुआ तेरी बात रहे.

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मेरी भी  इतनी ही दुआ तेरी बात रहे.
तेरे कदमो में दिन हो जुल्फ में ये रात रहे,

उम्र भर हो तेरी शिकायते मुझसे ए "सनम "
हो तल्ख़ बात भले मुझसे तेरी शाम ओ शहर/

कभी तेरे तो कभी मेरे दिल की बातों में,
हम रहे न रहे जिन्दा रहे जज्बातों में /

दिल अगर टूटता है तो ये टूट जाया करे ,
पर ये खावाहिस न कभी दूर हमसे जाया करे/

वक़्त हो आखिरी और मौत हो सर पर मेरे,
है गुजारिश तेरे हाथों में मेरा हाथ रहे /

मेरी भी  इतनी ही दुआ तेरी बात रहे.
तेरे कदमो में दिन हो जुल्फ में ये रात रहे,

Saturday, August 24, 2013

मजा तो तब है तेरी जब, तुझी से ही लड़ाई हो



ज़माने भर से हो रंजिश, घटा कैसी ही छाई हो,
मजा तो तब है तेरी जब, तुझी से ही लड़ाई हो/

सितारे गर्दिशो में हो, मुकद्दर हाशिये पर हो ,
रहे इम़ा तेरा सच्चा, की जब जब सर उठाई हो /

हो जब ये हौसला तेरा, मुसलसल कारवां तेरा,
हो शोले आंख में तेरे, मशालें जब जलाई हो /

क़यामत से तू ले लोहा, खुदा भी देखता होगा,
अजानो में मगर तेरे उसी की ही खुदाई हो/ 

नहीं मुमकिन तेरा दिलवर  हमेशा साथ हो तेरे ,
असल जज्बा मुहब्बत का मुहब्बत में जुदाई हो/

ज़माने भर से हो रंजिश, घटा कैसी ही छाई हो,
मजा तो तब है तेरी जब, तुझी से ही लड़ाई हो/
  

Monday, August 19, 2013

आओ देखे जिंदगी शहरों में तकितनी तल्ख़ है/ (राजधानी दिल्ली में रेलवे स्टेशन की घटना)


जुल्म की हद तक पहुंचती ये कहानी, देखिये 
 शहर के रस्तों पे बिखरी जिन्दगानी देखिये /

एक  बुढा था वहां सोये हुए फुटपाथ पर,
दे रहे थे लोग सिक्के चन्द उसके हाथ पर/ 

वस्त्र जिसके थे फटे चोटें लगी थी पाव में,
बेशहारा सा पड़ा था पुल के नीचे छाव में/

था गला सुखा हुआ होठों पे जिसके प्यास थी।
उस अभागे दीन की बेबस बहुत आवाज थी।

फिर वहीं कुछ दूरी पर झोला संभाले साथ में,
आ रही थी पानी ले कर एक लड़की हाथ में/

बैठ कर जैसे ही वो पानी पिलाने लग गयी,
देख कर ये दृश्य आँखें डब-डबाने लग गयी/

पैर पर छाले, जली चमड़ी थी जिसकी धुप में,
आ गयी शायद गरीबी अपने असली रूप में /

कुछ फटे और कुछ अधूरे वस्त्र में थी वो खड़ी ,
लगा रहा था जैसे बच्ची हो गयी है अब बड़ी  /  

अब तलक सब बेखबर जाने लगे उस ओर से,
भीख भीखू को दिया बेटी को देखे गौर से/

इस हवस के धुप में रूहे थी सबकी जल गयी,
देखते ही देखते ये शाम भी अब ढल गयी /

शाम को सब लोग घर को थे लगे अब लौटने ,
उनका तो फुटपाथ है घर वे लगे अब लेटने /

देके सिक्कों को कहा बेटी तू जा बाज़ार को ,
रोक लेंगे आज हम इस  भूख अत्याचार को /

बच गए सिक्के तो मरहम भी तू लाना घाव के,
लोग अब बचने लगें है गंध से इस पांव के /

ऐसा ही चलता रहा तो भीख कैसे पाएँगे ,
इतने महंगे वक़्त में हम कैसे दोनों खायेंगे /

बस करो मुझको बताना अब न मैं सुन पाऊँगी,
जो मिलेगा इतने में ले कर मैं वापस आउंगी /

ऐसा वादा करके वो बाज़ार में थी आ गयी,   
सभ्यता के भीड़ में बच्ची वो अब घबरा गयी /

हर तरफ इस भीड़ का फैला  हुए सैलाब था ,
हर कोई आगे निकलने के लिए बेताब था /

जैसे ही  उसकी नजर इक ओर ढाबे पर गयी,
बेखबर सी होके उसकी ओर जाने  लग  गयी/

दो कदम  आगे  गयी तो  कार  से टकरा गयी,   
हाथ से सिक्के गए ओर चॊट भी वो खा गयी/

बेतहाशा हो के वो सिक्के लगी थी खोजने ,
कार से साहब निकल क़र लग गए थे कोसने/
                
गन्दगी नाली के हो, कीड़ो के जैसे रेंगते!
जी में आता है  तुम्हे कूड़े में जा के फेंक दे!!

चॊट के अवसाद से पीड़ा से पीड़ित हो गयी,
गालियाँ सुनकर के ऐसी, जोर से वो रो गयी/

ख़त्म कर ये माज़रा साहब भी थे जाने लगे,
बेसहरा  देख  लड़की  भेड़िये  आने  लगे/

तब समझ आया की ये बाज़ार भी अब खुल गया,
अब तो हर नैतिक अनैतिक एक ही में घुल गया/

उसकी मजबूरी पे जैसे बोलियाँ लगने लगी,
आंख से घडियालों की फिर नालियां बहने लगी/

एक सज्जन ने कहा तू काम न ले क्रोध से,
हल नहीं होगी तेरी दिक्कत तेरे प्रतिरोध से/

ले पकड पैसे तू चल मुश्किल तेरी हम बाँट लें,
करना है इतना तुझे बस बात मेरी मान ले/

तब समझ आया मुझे कितना दरिंदा दौर है,
रोटी की कीमत यहाँ सिक्का नहीं कुछ और है/ 

क्या हुआ बूढ़े का जो लेटा है अब तक आस में,
लौट कर आई  नहीं बेटी क्या उसके पास मे

अब भी कितने लोग मुझसे पूछते हैं ये सवाल।
क्या रहा बुड़े का राजीव कैसा है लड़की का हाल

में तो तब भी मौन था और आज भी में मौन हूँ ,
पूछता हूँ देश से कह दो न की मैं कौन हूँ/

सैकड़ों भीखू  को  कैसे ये शहर है खा रहा
है ये मुर्दों का शहर महलों पे  क्यूँ इतरा रहा/

क्या गुलामी के लिए बच्चे नहीं अब बाध्य है,
क्या गरीबी के ये सारे रोग अब तक साध्य  हैं/

क्या ये ही जनतंत्र है या हमारी चेतना,
क्यूँ नहीं महसूस करते हम किसी की वेदना/ 

कौन सा जन गन का मन है ये किस तरह का राष्ट्र है,
शहरों की सडको पे नंगे धर्म हैं या शास्त्र हैं/ 

भूख से लड़ते हुए लोगो का जीवन गर्त है ,
रोटी के बदले बदन जीने की पहली शर्त है/ 

Rajeev Kumar

ये गाँधी वाद ऐसा है , ये गाँधी वाद वैसा है /

जिनका नहीं अपना वाद कोई ,
जो नाही हैं अपवाद कोई ,

ये हमको बताते रहते हैं ,
हस हस कर हम से कहते हैं/

ये गाँधी वाद ऐसा है ,
ये गाँधी वाद वैसा है /

विधुत विश्लेषण करते हैं,
मुद्रा संसलेषण करते हैं /

मेरे देश के बाबा ऐसे हैं,
नित्य नए अन्वेशण करते हैं,


सिक्षा का उनके क्या कहना,
अनपढ़ तुम मेरे चेले रहना/


पथ परदर्शक हैं ये अगुआ हैं
बस ट्रेड मार्क ये भगवा है


भक्ति का भाव निराला है
इस दाल में कुछ तो कला है,


चलो इनका भी कुछ करते हैं
छाती पर उनके चड़ते हैं/


जो हमको बताते रहते हैं,
खुद भ्रष्ट हैं जो ये कहते है/


ये गाँधी वाद ऐसा है ,
ये गाँधी वाद वैसा है/

Sunday, August 4, 2013

राहें उल्प्फत पे नादान तू जाता क्यूँ है ,

राहें उल्प्फत पे नादान तू जाता क्यूँ है ,


किसी के तंज को दिल से यूँ लगाता क्यूँ है /

 है कोई शिकवा कोई रंज तो ये रश्म न कर,

किसी भी हाल में देने का साथ, कश्म न कर /

 डर है इतना ही तो इश्क में आता क्यूँ है ,

राहें उल्प्फत पे नादान तू जाता क्यूँ है /

दूर हो जाओ हम से जब तो, ऐसा तुम करना,


दूर हो जाओ हम से जब तो, ऐसा तुम करना,
श्मृतियों के आंगन में, भावों से क्रीडा करना / 

 नहीं सरल तो, नहीं विरल भी जीवन के सतरंगी पथ, 
यही सत्य है यही गत्य है जीवन का बजरंगी तथ्य/ 

 जीवन युद्ध में निपुण बना कर, दूर कहाँ अब जाओगे ,
 द्रिड निश्चय है पितृ पक्ष में मुझसे मिलने आओगे 

 मृत्यु भी है अश्व मेघ कह देना अब देवो से , 
विश्व विजयी तो बन ही गए हो स्वर्ग विजय भी कर लेना/ 

 स्वर्ग विजय कर विजय पताका जैसे ही फहराओगे,
मुझे याकि है पुनर्जन्म में मेरा साथ निभाओगे.

अब निर्माणों की और चलो /


छोड़ त्रासदी के घावों को उम्मीदों के ओर चलो ,
 संत्रासों के कुंठा के भावों को पीछे छोड़ चलो ,

 नहीं अनंत ये जीवन तो, लोभ क्यूँ रहे जीने का
 संतापों के सागर को तज उल्लासों की ओर चलो ,

 कौन रहा अब कोई तपस्वी, कहाँ गयी वो दैविक शक्ति,
व्यर्थ कर रहा समय राजीव कहाँ कृष्ण और कैसी भक्ति ,

 स्वतः सम्ब्भाला है मानव ने अपने मानव जीवन को,
 छोड़ विनाश के प्रतिफल को अब निर्माणों की और चलो /

कभी नहीं माँगा हमने जीवन के संत्रासो को /

कभी नहीं माँगा हमने जीवन के संत्रासो को / 
भुत भविष्य के मध्य रक्खा है अपनी मिटती स्वाशों को/ 

 जब भी चाहा, करुना के करुनाकर से रार किया /
 वक़्त बेवक़्त के मध्य रखा है दुर्बल इन प्रयाशों को/

 मेरी जड़ता का हे भंते न ऐसे उपहास करो / 
बुद्धिजीवी हो भाग्य उदित हैं बुद्धि का व्यापर करो / 

 कण कण मैं है रूप प्रभु का कैसे प्रभु को पाते हो / 
रोटी के टुकरों से हे प्रभु गायब क्यूँ हो जाते हो/ 

 भूख देवता के समक्ष स्वयं को नतमस्तक सा पाता हूँ / 
भीख भूख के मध्य रक्खा है गिरते पड़ते लाशो को /

क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों से/


भावुकता के भरमारों से, नैतिकता के अम्बारो से, 
क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों  से/ 

गाथाये निकली हैं जिनकी, मरुभूमि से बंजर से , 
राज्य सर्वथा किया स्थापित, अपने खुनी खंजर से / 

दसकों  तक कवियों ने भी हमको संशय में डाला था , 
कहते हैं चेतक से पड़ गया हवा का पाला था / 

ये राज व्यवस्था कैसी थी, पूछो ना क्रुद्ध अछूतों से. 
सूरा, सुंदरी, चकला के संरक्षक, वीर सपूतों से/ 

युद्धधर्म से, राज्यधर्म से या वेदों के अभिमानों से, 
कितनी सतियों को जीवित, लाये हो तुम शमशानों से / 

“गाथाओं की शिक्षा में कुछ और नहीं बस गर्जन है, 
साम्यवाद की हत्या कर ये अर्थ वाद का सृजन है /” 

भावुकता के भरमारों से, नैतिकता के अम्बारो से, 
क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों से/

गौ माता के नाम पर

हिदुस्तान में  सच्चे हिन्दू रह गए हैं चन्द, 
गौ माता के नाम पर रोज करiते बंद / 

 गोबर को अमृत कहते, चरणामृत गो मूत्र
 हे माँ तुमने क्या किया बिया गयी हो पुत्र / 

 लाख प्रार्थना किया न बछिया हमने पाई, 
भाग्य कर गया खेल ले गया उसे कसाई 

 सत्य सनातन भारत भगवा देखा ऐसा. 
 कमा रहे हैं हिन्दू बछड़ा बेच के पैसा /

मेरी गजलों की भी अपनी, इक कहानी है

ए खुदा तेरी मेहरबानी है 
मेरे भीतर जो सचबयानी है 
शाइरी रोज इक तमाशा है 
शाइरी रोज इक कहानी है

दर्द ने दिल ने हिज्र औ गम ने 
कल बिठा करके कह रहे थे कि
बार बार हम को न सताया करो 
रोज दुखती है इन रगों को तुम 
वक्त बे वक्त न दबाया करो, 
दर्द हमको भी बहुत होते हैं
तेरी गज़लों में हम ही रोते है

कल तो अहसास ने भी खूब यूँ गजब ढाया,
बेवजह उसने मेरे गम को बहुत धमकाया/ 
हर घडी सुध जो खो के रहता है , 
रात अहसास मुझ से कहता है , 

फूल पत्तों की परिन्दों की जबां सुनता हूं 
रोज गमगीन पहाङों की जबां सुनता हूं 
क्या कहूं मुझसे नदी बोल रही है क्या क्या 
एक लम्हे से सदी बोल रही है क्या क्या 
मुझको बारिस की घटाओं ने पकङ रक्खा है
मुझको सबनम की सदाओं ने पकङ रक्खा है।
तीरगी मेरी तबीयत को समझ लेती है 
रौशनी मेरी जरूरत को समझ लेती है 
शह्र की भीङ से अब दूर मुझे ले जाओ
मुझसे वीरानीयां कहती हैं की अब आ जाओ 

चलो बस भी करो अब दिल से आओ बात करें. 
दिल की हर एक जरूरत से मुलाक़ात करें 
फिर मेरे दिल ने मेरा हाथ पाकङ करके कहा, 
मुझको तुम माफ करो मैं भी तुम्हारा न रहा।


दिल की दुनिया को हिफाजत से रखा जाता है 
दिल की दुनिया में शराफत से रहा जाता है।
दिल की दुनिया में अजीयत का सबब दिल ही है 
दिल की दुनिया में मलामत का सबब दिल ही है 
दिल की दुनिया में महब्बत की जगह होती है 
दिल की दुनिया में इबादत की जगह होती है
दिल कि दुनिया में हर इक गम का बसेरा है पर 
दिल की दुनिया मे मसर्रत की जगह कोई नही 

एक ही दर्द से तकलीफ से मैं डरता हूं 
प्यार जिससे है उसी शख्स को अखरता हूं
रोज मैं ही हूँ वो जो टूटता बिखरता हूँ, 
तेरे सीने में हूँ पर उसे पे रोज मरता हूँ

दिल की बातों को सुन के इश्क़ ने कहा "अच्छा" 
तू तो झूठा है बड़ा आया तू नहीं  सच्चा 
तेरी बातों में आ के इश्क़ मेरा नाम हुआ , 
हर गली चौक चोराहे पे मैं बदनाम हुआ 

इश्क से बढ़ के बर्गूजीना क्या 
इश्क दिल में नहीं तो जीना क्या 
इश्क दीवार भी है दर भी है। 
इश्क दुनिया है एक घर भी है 
इश्क में हर तरफ ही बंधन है 
इश्क का हर कोई ही दुश्मन है 
इश्क़ का दोस्त एक पंखा है
इश्क़ आखिर में उस पे लटका है
ये है अंजाम फिर भी जिंदा हूं 
खत्म जो ना हो ऐसा किस्सा हू
मै तबाही भी हूं दुआ भी हू 
आग हूं और मैं हवा भी हूं 
मुझसे ज्यादा अमीर कोई नही 
मेरे जैसा फकीर कोई नहीं 

अब तो हर रोज का ये किस्सा है , 
मेरी गजलों में इनका  हिस्सा है 
बात ये है तो कर रहा हूं मैं
हर घडी इनसे लड़ रहा हूं मैं 
मुझको पागल बनाये रहते हैं 
मुझको ख्वाबों में रोज दिखते हैं 
ये हकीकत भी ख्वाब जैसा है 
अब तो कांटा गुलाब जैसा है

सच है इनसे ही जिंदगानी है 
आप हैं मैं हूं और जवानी है
ये मेरे जहन की रवानी है।
मेरी गजलों की ये कहानी है।

राजीव कुमार 

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...