Monday, August 19, 2013

आओ देखे जिंदगी शहरों में तकितनी तल्ख़ है/ (राजधानी दिल्ली में रेलवे स्टेशन की घटना)


जुल्म की हद तक पहुंचती ये कहानी, देखिये 
 शहर के रस्तों पे बिखरी जिन्दगानी देखिये /

एक  बुढा था वहां सोये हुए फुटपाथ पर,
दे रहे थे लोग सिक्के चन्द उसके हाथ पर/ 

वस्त्र जिसके थे फटे चोटें लगी थी पाव में,
बेशहारा सा पड़ा था पुल के नीचे छाव में/

था गला सुखा हुआ होठों पे जिसके प्यास थी।
उस अभागे दीन की बेबस बहुत आवाज थी।

फिर वहीं कुछ दूरी पर झोला संभाले साथ में,
आ रही थी पानी ले कर एक लड़की हाथ में/

बैठ कर जैसे ही वो पानी पिलाने लग गयी,
देख कर ये दृश्य आँखें डब-डबाने लग गयी/

पैर पर छाले, जली चमड़ी थी जिसकी धुप में,
आ गयी शायद गरीबी अपने असली रूप में /

कुछ फटे और कुछ अधूरे वस्त्र में थी वो खड़ी ,
लगा रहा था जैसे बच्ची हो गयी है अब बड़ी  /  

अब तलक सब बेखबर जाने लगे उस ओर से,
भीख भीखू को दिया बेटी को देखे गौर से/

इस हवस के धुप में रूहे थी सबकी जल गयी,
देखते ही देखते ये शाम भी अब ढल गयी /

शाम को सब लोग घर को थे लगे अब लौटने ,
उनका तो फुटपाथ है घर वे लगे अब लेटने /

देके सिक्कों को कहा बेटी तू जा बाज़ार को ,
रोक लेंगे आज हम इस  भूख अत्याचार को /

बच गए सिक्के तो मरहम भी तू लाना घाव के,
लोग अब बचने लगें है गंध से इस पांव के /

ऐसा ही चलता रहा तो भीख कैसे पाएँगे ,
इतने महंगे वक़्त में हम कैसे दोनों खायेंगे /

बस करो मुझको बताना अब न मैं सुन पाऊँगी,
जो मिलेगा इतने में ले कर मैं वापस आउंगी /

ऐसा वादा करके वो बाज़ार में थी आ गयी,   
सभ्यता के भीड़ में बच्ची वो अब घबरा गयी /

हर तरफ इस भीड़ का फैला  हुए सैलाब था ,
हर कोई आगे निकलने के लिए बेताब था /

जैसे ही  उसकी नजर इक ओर ढाबे पर गयी,
बेखबर सी होके उसकी ओर जाने  लग  गयी/

दो कदम  आगे  गयी तो  कार  से टकरा गयी,   
हाथ से सिक्के गए ओर चॊट भी वो खा गयी/

बेतहाशा हो के वो सिक्के लगी थी खोजने ,
कार से साहब निकल क़र लग गए थे कोसने/
                
गन्दगी नाली के हो, कीड़ो के जैसे रेंगते!
जी में आता है  तुम्हे कूड़े में जा के फेंक दे!!

चॊट के अवसाद से पीड़ा से पीड़ित हो गयी,
गालियाँ सुनकर के ऐसी, जोर से वो रो गयी/

ख़त्म कर ये माज़रा साहब भी थे जाने लगे,
बेसहरा  देख  लड़की  भेड़िये  आने  लगे/

तब समझ आया की ये बाज़ार भी अब खुल गया,
अब तो हर नैतिक अनैतिक एक ही में घुल गया/

उसकी मजबूरी पे जैसे बोलियाँ लगने लगी,
आंख से घडियालों की फिर नालियां बहने लगी/

एक सज्जन ने कहा तू काम न ले क्रोध से,
हल नहीं होगी तेरी दिक्कत तेरे प्रतिरोध से/

ले पकड पैसे तू चल मुश्किल तेरी हम बाँट लें,
करना है इतना तुझे बस बात मेरी मान ले/

तब समझ आया मुझे कितना दरिंदा दौर है,
रोटी की कीमत यहाँ सिक्का नहीं कुछ और है/ 

क्या हुआ बूढ़े का जो लेटा है अब तक आस में,
लौट कर आई  नहीं बेटी क्या उसके पास मे

अब भी कितने लोग मुझसे पूछते हैं ये सवाल।
क्या रहा बुड़े का राजीव कैसा है लड़की का हाल

में तो तब भी मौन था और आज भी में मौन हूँ ,
पूछता हूँ देश से कह दो न की मैं कौन हूँ/

सैकड़ों भीखू  को  कैसे ये शहर है खा रहा
है ये मुर्दों का शहर महलों पे  क्यूँ इतरा रहा/

क्या गुलामी के लिए बच्चे नहीं अब बाध्य है,
क्या गरीबी के ये सारे रोग अब तक साध्य  हैं/

क्या ये ही जनतंत्र है या हमारी चेतना,
क्यूँ नहीं महसूस करते हम किसी की वेदना/ 

कौन सा जन गन का मन है ये किस तरह का राष्ट्र है,
शहरों की सडको पे नंगे धर्म हैं या शास्त्र हैं/ 

भूख से लड़ते हुए लोगो का जीवन गर्त है ,
रोटी के बदले बदन जीने की पहली शर्त है/ 

Rajeev Kumar

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