Sunday, August 4, 2013

क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों से/


भावुकता के भरमारों से, नैतिकता के अम्बारो से, 
क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों  से/ 

गाथाये निकली हैं जिनकी, मरुभूमि से बंजर से , 
राज्य सर्वथा किया स्थापित, अपने खुनी खंजर से / 

दसकों  तक कवियों ने भी हमको संशय में डाला था , 
कहते हैं चेतक से पड़ गया हवा का पाला था / 

ये राज व्यवस्था कैसी थी, पूछो ना क्रुद्ध अछूतों से. 
सूरा, सुंदरी, चकला के संरक्षक, वीर सपूतों से/ 

युद्धधर्म से, राज्यधर्म से या वेदों के अभिमानों से, 
कितनी सतियों को जीवित, लाये हो तुम शमशानों से / 

“गाथाओं की शिक्षा में कुछ और नहीं बस गर्जन है, 
साम्यवाद की हत्या कर ये अर्थ वाद का सृजन है /” 

भावुकता के भरमारों से, नैतिकता के अम्बारो से, 
क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों से/

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