भावुकता के भरमारों से, नैतिकता के अम्बारो से,
क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों से/
गाथाये निकली हैं जिनकी, मरुभूमि से बंजर से ,
राज्य सर्वथा किया स्थापित, अपने खुनी खंजर से /
दसकों तक कवियों ने भी हमको संशय में डाला था ,
कहते हैं चेतक से पड़ गया हवा का पाला था /
ये राज व्यवस्था कैसी थी, पूछो ना क्रुद्ध अछूतों से.
सूरा, सुंदरी, चकला के संरक्षक, वीर सपूतों से/
युद्धधर्म से, राज्यधर्म से या वेदों के अभिमानों से,
कितनी सतियों को जीवित, लाये हो तुम शमशानों से /
“गाथाओं की शिक्षा में कुछ और नहीं बस गर्जन है,
साम्यवाद की हत्या कर ये अर्थ वाद का सृजन है /”
भावुकता के भरमारों से, नैतिकता के अम्बारो से,
क्या प्रश्न करूं ऐसे धर्मो के ठेकेदारों से/
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