Wednesday, November 27, 2013

कभी तो बात कीजिये ,

कभी  तो  बात  कीजिये ,
हवा  का  रुख बदलने का ,
कटीले  रास्तों पे  साथ  साथ ,
मिल  के  चलने  का /
बहुत  चलें  हैं  नीद  में ,
रहे  हमेशा  भीड़  में ,
कि  वक़्त  आ  गया  है ,
इन  घरों से अब  निकलने  का /

अदब  से  गम  से  मान  से ,
हमी  मरे  हैं  जान  से /
हमारे  ही  लहू  से  हाथ ,
पोछते  वो  शान से /
कि  हमको भी  खबर  न  थी ,
हमारी  इक  डगर  न  थी ,
उठो  समय  नहीं  है  अब 
ये  भेड़  चाल  चलने  का /

जहर  ये  मजहबी  हमे  तो ,
आज  भी  डरा  रहा ,
वो  देख  लो  सड़क  पे ,
आम  आदमी  कराह  रहा /
हमारे  घर  में  घुस  रहे 
हमी  को   ही  जला  रहे ,
ये  आग  कह  रही  है  अब  
समय  है  बस  उबलने  का /

घडी  सदी  कि  आज  भी ,
वही  पे  है  रूकी  हुई /
अभी  भी  जातियों  में  है ,
ये  बस्तियां  बटी  हुई /
चलो  इन्हे  भी  जोड़  दें ,
पुरानी  रश्मे  तोड़  दें ,
रुकी  घड़ी  बदल  दें , की ,
समय  है  ये  बदलने  का /

नसल  को  नाड़ियों  से  अब 
निकाल  कर  के  फेक  दो ,
लहू  की  गर्मियों  से 
अपनी  धमिनियों  को  सेक  लो ,
कि  सांस न  हो  सर्द  से ,
ये  फासले  हैं  बर्फ  से /
समय  भी  आ  गया  है ,
अब  तो  बर्फ़  के  पिघलने  का /

कभी  तो  बात  कीजिये ,
हवा  का  रुख बदलने का ,
कभी  तो  बात  कीजिये ,
समय  को ही बदलने  का /
कभी  तो  बात  कीजिये ,
उबलने  का, उबलने  का /
कभी  तो  बात  कीजिये न ,
साथ  मिल  के  चलने  का /

राजीव कुमार

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