कभी तो बात कीजिये ,
हवा का रुख बदलने का ,
कटीले रास्तों पे साथ साथ ,
मिल के चलने का /
बहुत चलें हैं नीद में ,
रहे हमेशा भीड़ में ,
कि वक़्त आ गया है ,
इन घरों से अब निकलने का /
अदब से गम से मान से ,
हमी मरे हैं जान से /
हमारे ही लहू से हाथ ,
पोछते वो शान से /
कि हमको भी खबर न थी ,
हमारी इक डगर न थी ,
उठो समय नहीं है अब
ये भेड़ चाल चलने का /
जहर ये मजहबी हमे तो ,
आज भी डरा रहा ,
वो देख लो सड़क पे ,
आम आदमी कराह रहा /
हमारे घर में घुस रहे
हमी को ही जला रहे ,
ये आग कह रही है अब
समय है बस उबलने का /
घडी सदी कि आज भी ,
वही पे है रूकी हुई /
अभी भी जातियों में है ,
ये बस्तियां बटी हुई /
चलो इन्हे भी जोड़ दें ,
पुरानी रश्मे तोड़ दें ,
रुकी घड़ी बदल दें , की ,
समय है ये बदलने का /
नसल को नाड़ियों से अब
निकाल कर के फेक दो ,
लहू की गर्मियों से
अपनी धमिनियों को सेक लो ,
कि सांस न हो सर्द से ,
ये फासले हैं बर्फ से /
समय भी आ गया है ,
अब तो बर्फ़ के पिघलने का /
कभी तो बात कीजिये ,
हवा का रुख बदलने का ,
कभी तो बात कीजिये ,
समय को ही बदलने का /
कभी तो बात कीजिये ,
उबलने का, उबलने का /
कभी तो बात कीजिये न ,
साथ मिल के चलने का /
राजीव कुमार
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