Friday, November 22, 2013

तजुर्बा मुझे अब ये होने लगा है ,

तजुर्बा मुझे अब ये होने  लगा है ,
कोई राह में कांटें बोने  लगा है  /

अंधेरों कि अब तो जरुरत नहीं है ,
कि रिस्ता  उजालो में खोने लगा है /

शहर  की चमक का तो मतलब यही है ,
सलीब-ऐ-जिश्म  इन्सा  ढोने लगा  है

क़यामत है क्या गौर कीजे  जारा सा,
वो भूखा सड़क पे जो सोने लगा  है /

वो माँ ही बताएगी ममता कि कीमत,
देहड़ी पे है  बच्चा रोने लगा  है /

यहाँ के मोहल्ले  का मजहब गजब है,
लहू से हर इक हाथ धोने लगा  है/

Rajeev Kumar

No comments:

Post a Comment

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...