तजुर्बा मुझे अब ये होने लगा है ,
कोई राह में कांटें बोने लगा है /
अंधेरों कि अब तो जरुरत नहीं है ,
कि रिस्ता उजालो में खोने लगा है /
क़यामत है क्या गौर कीजे जारा सा,
वो भूखा सड़क पे जो सोने लगा है /
वो माँ ही बताएगी ममता कि कीमत,
देहड़ी पे है बच्चा रोने लगा है /
यहाँ के मोहल्ले का मजहब गजब है,
लहू से हर इक हाथ धोने लगा है/
Rajeev Kumar
कोई राह में कांटें बोने लगा है /
अंधेरों कि अब तो जरुरत नहीं है ,
कि रिस्ता उजालो में खोने लगा है /
शहर की चमक का तो मतलब यही है ,
सलीब-ऐ-जिश्म इन्सा ढोने लगा है
क़यामत है क्या गौर कीजे जारा सा,
वो भूखा सड़क पे जो सोने लगा है /
वो माँ ही बताएगी ममता कि कीमत,
देहड़ी पे है बच्चा रोने लगा है /
यहाँ के मोहल्ले का मजहब गजब है,
लहू से हर इक हाथ धोने लगा है/
Rajeev Kumar
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