खबर वालों के अख़बारों में खबरी लाल लिखते हैं,
ये साहब बिकते हैं पहले तभी कुछ हाल लिखते हैं/
न जाने कैसे कैसे इस जहाँ में हैं बड़े शायर,
कभी ये हुस्न लिखते है किसी के गाल लिखते हैं/
गजल कि रूह का मतलब भला वो कैसे समझेंगे,
जो कत्ले आम कि खबरे यहाँ हर साल लिखते हैं/
यहाँ लिखना सियासत में वफादारी का सिम्बल है,
यहाँ टिकते वही हैं जो किसी का काल लिखते है,
गरीबी कि बीमारी का असर है मुल्क पर यारों,
दवा कि पर्चियों पे भी ये रोटी दाल लिखते हैं /
हमारी सभ्यता कि आज अस्मत लुट गयी शायद ,
यहाँ तो आज कल इंसान को भी मॉल लिखते हैं /
राजीव कुमार
ये साहब बिकते हैं पहले तभी कुछ हाल लिखते हैं/
न जाने कैसे कैसे इस जहाँ में हैं बड़े शायर,
कभी ये हुस्न लिखते है किसी के गाल लिखते हैं/
गजल कि रूह का मतलब भला वो कैसे समझेंगे,
जो कत्ले आम कि खबरे यहाँ हर साल लिखते हैं/
यहाँ लिखना सियासत में वफादारी का सिम्बल है,
यहाँ टिकते वही हैं जो किसी का काल लिखते है,
गरीबी कि बीमारी का असर है मुल्क पर यारों,
दवा कि पर्चियों पे भी ये रोटी दाल लिखते हैं /
हमारी सभ्यता कि आज अस्मत लुट गयी शायद ,
यहाँ तो आज कल इंसान को भी मॉल लिखते हैं /
राजीव कुमार
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