कभी नहीं माँगा हमने जीवन के संत्रासो को /
भुत भविष्य के मध्य रक्खा है अपनी मिटती स्वाशों को/
जब भी चाहा, करुना के करुनाकर से रार किया /
वक़्त बेवक़्त के मध्य रखा है दुर्बल इन प्रयाशों को/
मेरी जड़ता का हे भंते न ऐसे उपहास करो /
बुद्धिजीवी हो भाग्य उदित हैं बुद्धि का व्यापर करो /
कण कण मैं है रूप प्रभु का कैसे प्रभु को पाते हो /
रोटी के टुकरों से हे प्रभु गायब क्यूँ हो जाते हो/
भूख देवता के समक्ष स्वयं को नतमस्तक सा पाता हूँ /
भीख भूख के मध्य रक्खा है गिरते पड़ते लाशो को /
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