मुनाशिब तो ये ही होता की खंजर खून न होता,
हमारे मुल्क में ऐसा कोई जूनून न होता/
यहाँ की मजहबी गर्मी का मौसम ये नहीं कहता,
यहीं रहता हूँ तो फिर ये महिना जून न होता/
कई मस्जिद कई मंदिर अगर होते मोहल्ले में,
दीवारों की मगर सुर्खी किसी का खून न होता/
हुकूमत के महकमे मे सियासत मे यही होता,
यहाँ कानून के ऊपर कोई नाखून न होता/
अगर होता ये मुमकिन तो कोई मजबूर न होता,
कोई मजबूर हो जाता तो वो मजलूम न होता
राजीव कुमार
हमारे मुल्क में ऐसा कोई जूनून न होता/
यहाँ की मजहबी गर्मी का मौसम ये नहीं कहता,
यहीं रहता हूँ तो फिर ये महिना जून न होता/
कई मस्जिद कई मंदिर अगर होते मोहल्ले में,
दीवारों की मगर सुर्खी किसी का खून न होता/
हुकूमत के महकमे मे सियासत मे यही होता,
यहाँ कानून के ऊपर कोई नाखून न होता/
अगर होता ये मुमकिन तो कोई मजबूर न होता,
कोई मजबूर हो जाता तो वो मजलूम न होता
राजीव कुमार
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