छोड़ त्रासदी के घावों को उम्मीदों के ओर चलो ,
संत्रासों के कुंठा के भावों को पीछे छोड़ चलो ,
नहीं अनंत ये जीवन तो, लोभ क्यूँ रहे जीने का
संतापों के सागर को तज उल्लासों की ओर चलो ,
कौन रहा अब कोई तपस्वी, कहाँ गयी वो दैविक शक्ति,
व्यर्थ कर रहा समय राजीव कहाँ कृष्ण और कैसी भक्ति ,
स्वतः सम्ब्भाला है मानव ने अपने मानव जीवन को,
छोड़ विनाश के प्रतिफल को अब निर्माणों की और चलो /

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