Monday, December 16, 2013

अगर जो आप कहते हो वही आबो हवा है तो

*ग़ज़ल*

जो अपने हाल पर खुश हो तो क्यूँ बे नूर रहते हो।
कहो किस डर से तुम भी हर घड़ी रंजूर रहते हो।

वो जो अख़बार में है  गर उसे तुम मानते हो सच।
तो अपने मुल्क के  सच से  बहुत ही दूर रहते हो।

तरक्की क्यूँ  नहीं चल कर  हमारे  पास आती है।
मुझे डर  है यही तुम  सोच कर  मजबूर रहते हो।

यहाँ पर  मजहबी  सैलाब  में जब  लोग  मरते हैं।
कभी  रोका  है जा कर  या वहाँ  से  दूर रहते हो?

बहुत अच्छा हुनर है झूठ को सच की तरह कहना।
मगर जब सच हो कहना तो कहाँ काफूर रहते हो।

गरीबी ज़ख्म है इस मुल्क़ के सीने पे तो क्या तुम।
कभी  बनते  हो  मरहम  या सदा नासूर  रहते हो?

तुम्हारी  देशभक्ति  पर  भरोसा  कौन   कर  लेगा!!
नसल  के नाम  पर  तुम भी  नशे में  चूर  रहते  हो।

राजीव कुमार

रंजूर - दुखी
क़ाफूर- गायब

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