Wednesday, December 18, 2013

सूरज हो या चाँद इशारा करता है,

सूरज हो या चाँद इशारा करता है,
बेघर ही हर बार तो हारा करता है/

कपड़ो के अंदर, भला क्या बचता है,
खादी ही लोगों को मारा करता है/

दफ्तर दफतर फिरते फिरते जान गया,
डिग्री से ईमान भी गुजारा करता है/

दौलत कि चाहत में अब न जाने क्युं।
रिश्तों से इंसान किनारा करता है।

जाने वाले छोड़ हमेशा जाते है
प्रेम हमारा उन्हें पुकारा करता है

राजीव कुमार

1 comment:

  1. कपड़ो के अंदर भला क्या बचता है
    22 22 21 22 22 2
    क्या अंदर भला का वजन सही है पूरी गजल में है तो इसे कृपया समझिए श्रीमान आप की अति कृपया होगी धन्यवाद।

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