Thursday, December 15, 2016

जब से कोलेज तुम आ गई दिलरुबा

कुछ नया कहने की कोशिश

जब से कोलेज तुम आ गई दिलरुबा
तब से दिल बन गया जुर्म का सरगना

आशिकों के लिये तेरी हर इक अदा।
जैसे कश्मीर में लश्कर ए तय्यबा।

चांद भी सोचता रह गया क्या कहूं ।
देख कर बस तुझे देखता रह गया।

जिक्र तेरा गजल में किया जब कभी
हर किसी ने कहा मरहबा मरहबा।

इश्क सर पर मिरे चढ़ गया क्या करूं।
दोस्तो  अब मुझे ले चलो आगरा

इश्क सबके लिये है उसे छोड़ कर
जो भी उन्नीस से कम का है छोकरा

राजीव कुमार

खुद के भीतर के वीरानों, में इन्सां जो भटका है

खुद के भीतर के वीरानों, में इन्सां यूं  भटका है
जैसी बस्ती कस्बा नगरी, पैदल पैदल फिरता है।

दुनिया भर के दर्दों को भी, है उससे हमदर्दी ही।
अपने पांवों के जख्मों पर, मन ही मन जो हँसता है।

अरमानों की सूली पर जो, ज़िन्दा लटका है उसके।
सीने के भीतर इक पत्थर, धक-धक धक-धक करता है।

फूलों कांटों जुगनू रातों,  और बहारों की आंखों में।
अक्श तुम्हारा सागर बन के, छलका छलका रहता है।

सच्चा झूठा आधा पूरा ,ख्वाब हकीकत  कौन है तू ।
मेरे भीतर तू है या फिर ,मुझको बाहर रक्खा है।

राजीव कुमार

उम्र भर कौन किसका रहबर है

उम्र भर कौन किसका रहबर है
हर कोई अपने गम के भीतर है

जिन्दगी मौत की लड़ाई में ।
जीत बस एक को मयस्सर है

रोज अखबार पढ़ के ये पाया
झूठ ही अब तो सच के उपर है

दर्दे दिल दर्दे सर न हो जाये।
आशिकी चीज भी तो दूभर है

राजीव कुमार

भूखों का भगवान नहीं था।

भूखों का भगवान नहीं था।
पर कोई बेजान नहीं था।

जितना आसां है अब मरना
तब उतना आसान नहीं था

बात ये तब की है यारों जब
जीने का सामान नहीं था

हिन्दू मुस्लिम सब तो थे पर।
कोई भी शैतान नहीं था ।

मुल्क गरीबी में था जब तक
कोई तुर्रम खान नहीं था।

राजीव कुमार

दश्ते उल्फत में गया मैं तो मिला कुछ भी नहीं।

ताजा गजल

दश्ते उल्फत में गया मैं तो मिला कुछ भी नहीं।
तेरी महफिल में तेरा सब हैं मिरा कुछ भी नहीं

दर्द देने को हर इक शक्स है तैयार यहां
ऐसी दुनिया में बुरा सब हैं भला कुछ भी नहीं

ख्वाब मेरे मूझे सोने भी नहीं देते हैं ।
रात सोया था कि जागा था पता कुछ भी  नहीं

जहनो दिल में है तूही और तेरी यादें हैं ।
गौर से देख मिरा मुझमें बचा कुछ भी नहीं

ये भी सच है कि खुशी हर किसी की हसरत है
ये भी सच है कि खुशी गम के बिना कुछ भी नहीं

गर जुदा हैं तो जुदाई का लुत्फ ले तू भी ।
रोज मिलने में बिछड़ने में मजा कुछ भी नहीं।

राजीव कुमार

अदब की बज्म को मिसरा नया दूं

फिलबदीह गजल कहने की कोशिश बज्म ए अदब ग्रुप पर ---------------- देखियेगा

अदब की बज्म को मिसरा नया दूं
इजाजत हो तो मैं मतला सुना दूं

दिलों के बीच की दूरी मिटा दूं।
मोहब्बत मैं जमाने को सिखा दूं

तजुर्बा दिल्लगी से टूटने तक
मोहब्बत करने वालों को बता दूं

मुझे मिल ही नहीं पाया जो अब तक
तो मै कैसे तुझे  उसका पता दूं ।

हकीकत में न जाने कब दिखेगे
तूझे ख्वाबों में अच्छे दिन दिखा दूं

लगाने वालों मुझको लाईनों में।
तुम्हे भी एक दिन ऐसी सजा दूं

तुम्हारी प्यास बढती जा रही है
लहू क्या मैं तुम्हे अपना पिला दूं

सियासत आ गयी फिर से अदब में ।
कहो मैं खुद को इसकी क्या सजा दूं

खुदाया गर मिले एजाज तेरा
मैं सहरा को भी इक दरिया बना दूं

कफस में जिस्म के हूं कैद अब तक
तूझे ए जिन्दगी मैं और क्या दूं

राजीव कुमार

आज की बज्म का खुदा है वो

गजल

आज की बज्म का खुदा है वो
सबकी गजलों में काफिया है वो

मिरे दिल में था इस लिये शायद
मेरे शेरों में आ गया है वो

हुस्न शोला गुलाब चेहरा है
जाने किस चीज से बना है वो

जिन्दगी देती है फजाओं को
खुश्बु ए गुल की इक हवा है वो

सारा कोलेज जिसके पीछे था
यारों अब मेरी दिलरुबा है वो

हाले दिल आप दिल से मत पूछो।
आज कल इश्क से डरा है वो

आशिकी शायरी बगावत भी
कितने किरदार में ढला है वो

मुझसे कुछ काम तो नहीं उसको
मुस्कुरा कर मुझे मिला है वो

राजीव कुमार

दो शेर और है खास दोस्तो के लिये

सीधा सच्चा है और भला है वो
आज के दौर में बुरा है वो

वादा अच्छे दिनों का है जो भी
कुछ नहीं सिर्फ झुनझुना हे वो

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...