सब कुछ तो पा चुका हूं तुम्हारे बगैर भी
हारा हुआ हूं फिर भी मैं हारे बगैर भी
लोगों में और उसमें यही फर्क है कि वो
सुनता है मेरा नाम पुकारे बगैर भी
घरबार तोड़ देने की तरकीब अस्ल में
लोगो को मार देना है मारे बगैर भी
माना कोई भी तुम सा जमीं पर नहीं मगर
मैं खुश हूं इस जमीं पे तुम्हारे बगैर भी
सबके लिए खुदा है मगर उनका क्या करें
जो लोग जी रहे हैं सहारे बगैर भी
दुनिया तो जीत सकते हैं पर जानते हैं हम
दुनिया थी और रहेगी हमारे बगैर भी
इतना हूं जल्दबाज कि दफ्तर कभी कभी
जाता हूं अपने बाल संवारे बगैर भी
मैं खुश हूं कामयाब हूं पर मसअला ये है
रातें गुजर रहीं हैं गुजारे बगैर भी
राजीव कुमार
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