Sunday, February 8, 2026

सब कुछ तो पा चुका हूं तुम्हारे बगैर भी

ग़ज़ल

सब कुछ तो पा चुका हूं तुम्हारे बगैर भी
हारा हुआ हूं फिर भी मैं हारे बगैर भी

लोगों में और उसमें यही फर्क है कि वो 
सुनता है मेरा नाम पुकारे बगैर भी

घरबार तोड़ देने की तरकीब अस्ल में 
लोगो को मार देना है मारे बगैर भी

माना कोई भी तुम सा जमीं पर नहीं मगर
मैं खुश हूं इस जमीं पे तुम्हारे बगैर भी

सबके लिए खुदा है मगर उनका क्या करें
जो लोग जी रहे हैं सहारे बगैर भी

दुनिया तो जीत सकते हैं पर जानते हैं हम
दुनिया थी और रहेगी हमारे बगैर भी

इतना हूं जल्दबाज कि दफ्तर कभी कभी
जाता हूं अपने बाल संवारे बगैर भी

मैं खुश हूं कामयाब हूं पर मसअला ये है
रातें गुजर रहीं हैं गुजारे बगैर भी

राजीव कुमार

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