Sunday, February 8, 2026

शेर जंगल का जब से बेदम है

ग़ज़ल 
शेर जंगल का जब से बेदम है
गीदड़ों की तभी से बम बम है

बंदरों को फकत यही गम है
एक गदहा यहां का रुस्तम है

गोरे कालों के देख कर झगड़े 
जेब्रा हंसते हंसते बेदम है

घांस घोड़ों को मिल नहीं पायी
और गदहों के मुह में चम चम है

आई सी सी है खेल शाहों का
अपने खातिर तो सिर्फ कैरम है

जिसको सब बादशाह समझते हैं 
वो रईशों की चांद बेगम है

हम भी ऐसे हिरन हैं जंगल के
जिसके हर इक कदम पे जोखम है

हर शिकारी का एम है हम पर
हमने जब से उठाया परचम है

इश्क़ के हक में बोलने वाला
 या तो गांधी है या तो गौतम है

राजीव कुमार

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