शेर जंगल का जब से बेदम है
गीदड़ों की तभी से बम बम है
बंदरों को फकत यही गम है
एक गदहा यहां का रुस्तम है
गोरे कालों के देख कर झगड़े
जेब्रा हंसते हंसते बेदम है
घांस घोड़ों को मिल नहीं पायी
और गदहों के मुह में चम चम है
आई सी सी है खेल शाहों का
अपने खातिर तो सिर्फ कैरम है
जिसको सब बादशाह समझते हैं
वो रईशों की चांद बेगम है
हम भी ऐसे हिरन हैं जंगल के
जिसके हर इक कदम पे जोखम है
हर शिकारी का एम है हम पर
हमने जब से उठाया परचम है
इश्क़ के हक में बोलने वाला
या तो गांधी है या तो गौतम है
राजीव कुमार
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