नहीं है ग़म कि मैं असफल रहा हूं
मगर हर हाल में अड़ियल रहा हूं
जो मरते-मरते फिर से जी उठा है
कभी इस तौर भी घायल रहा हूं
मेरी गगरी में गंगा जल है लेकिन
किसी के इश्क में मैं जल रहा हूं
तेरी चाहत के कांवड़ को उठा कर
मैं इक अरसे से पैदल चल रहा हूं
मैं अपने दिल की सुनता हूं हमेशा
तभी दुनिया को शायद खल रहा हूं
जिसे भगवान कहता है ज़माना
मैं उसके साथ पोलिटिकल रहा हूं
राजीव कुमार
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