Monday, April 11, 2022

इक दश्त की आगोश में बैठे हुए बुरांश

 इक दश्त की आगोश में बैठे हुए बुरांश

तुमको बुला रहे हैं ये खिलते हुए बुरांश


इस तौर सुर्ख रू हैं ये जंगल की वादियां ।

जैसे हों इनके बीच में जलते हुए बुरांश।


देना है क्या मिसाल लबो रुख को आपके

बतला रहे हैं आज ये हँसते हुए बुरांश


कंकङ चुभे न आपके पांवों में इस लिये  

शाखों से गिर गये हैं ये बिखरे हुए बुरांश


वादी ए नैनीताल की दिलकश जमीन पर

रक्खे हैं आप के लिये महके हुए बुरांश 


राजीव कुमार

दिल से लिब्रल हैं सख्त हो जायें?

 ग़ज़ल 


दिल से लिब्रल हैं सख्त हो जायें?

क्या करें हम भी भक्त हो जायें?


दिल की दुनिया उजाड़ कर हम भी

बोलो वहसत परस्त हो जायें ?


जैसे   मेरे   हुए   हैं   वैसे  ही 

सबके अरमान ध्वस्त हो जायें।


काम  कोई  नहीं  मगर हमसे 

लोग कहते है व्यस्त हो जायें 


ये जो दुनिया है छोङिये इसकी

आईये खुद में  मस्त हो जायें


इश्क़ वो इश्क़ ही नहीं जब तक 

बहते   आंसू  न   रक्त  हो जायें


जिसने ठुकरा दिया उसी की हम

उम्र  भर  क्युं गिरफ्त हो जायें


जितने आशिक हैं सब बने शाइर 

सारे  पौधे  दरख्त  हो  जायें


राजीव कुमार

उनको भी इस जहान की परवाह नहीं है

 ग़ज़ल 
उनको  भी  इस जहान की परवाह नहीं है 
हमको भी अपनी जान की परवाह नहीं है

नोवेल की हर हसीन कहानी में लिखा था 
आशिक  को  इम्तिहान  की परवाह नहीं है 

वो  भी  मेरे  बगैर   नहीं  जी   सकेगा  पर 
धरती  को  आसमान  की  परवाह  नहीं है

इस  तौर  मुझ को देख के मुह फेरते हैं वो 
जैसे  किसी  की  जान  की परवाह नहीं है

दिल है हसीन शाम है और मयकदा भी है 
शाइर  को  अब मकान की परवाह नहीं है

उनकी नजर को देख के लगता है हमें अब  
तीरों  को  भी  कमान  की परवाह नहीं है

जिनको लहू  से सींचा वही हमसे खफा हैं 
फूलों   को  बागबान  की   परवाह  नही है

जिन  की  जबान  बंद है क्यूँ आप उन्हीं से
कहते   हो   बेजुबान  की  परवाह  नहीं  है

दिल की करे तो आज भी कहता है जमाना
लङकी  को  खानदान  की  परवाह  नहीं है

राजीव कुमार

उनका  सलूक   ऐसा  है  जैसे  कि घरों में 
पैरों   को   पायदान   की  परवाह  नहीं  है

Thursday, January 6, 2022

हसरत जब रुख्सार से बातें करती है

ग़ज़ल

हसरत जब रुख्सार से बातें करती है 
बीनाई   दीदार   से   बातें  करती  है

एक यही अंदाज जुदा है बस उसका
रूठ के भी वो प्यार से बातें करती है

दो दिन घर में तन्हा रह कर जान गया
खिङकी  भी  दीवार से बातें करती है 

इश्क़ कहां होता है सच्चा जानते हो?
रूह जहां  किरदार  से बातें करती है

दरिया के तूफान से  वो  क्युं डर  जाये 
जो  कश्ती  मंझधार  से  बातें करती है

जीवन  के  इस  रेस  में हमने देखा है
मौत  सदा  रफ्तार  से  बातें  करती है

राजीव कुमार

पूछो न हमसे मुल्क के सदमे की बात और

पूछो न हमसे मुल्क के सदमे की बात और
साधू की बात और है गुण्डे की बात और।

जंगल मे देखना हो या पिजङे में दोस्तों     
चीते की बात और है बिल्ले की बात और।
 
कितनी भी हो चमक मगर ये सबको है पता 
सोने की बात और है कांसे की बात और। 

गांधी के कद को नापने वाले ओ बेवकूफ 
पर्वत की बात और हैं टीले की बात और।

कोई तो जा के अब भी बता दे ये बोस को
कुर्सी की बात और है ओहदे की बात और

तारीख बदलने की सनक में न भूलना 
मंजिल की बात और है रस्ते की बात और

हम इस लिये भी आपके बातों पे चुप हैं सर
कहने की बात और है करने को बात और

राजीव कुमार

जाति धरम के भाव से अब काम ना चली

भोजपुरी ग़ज़ल
जाति धरम के भाव से अब काम ना चली 
हमनी के ए  दुराव से अब काम ना चली 

अच्छा समाज एक आ दू दिन बनी ना
नेतागीरी के दाव से अब काम ना चली

हिन्दू मुसलमां सिक्ख इसाई के नाम पर
ए आपसी कटाव से अब काम ना चली 

अन्याय जुल्म हार या अवसाद के नियर
बेकार के दबाव से अब काम ना चली

सोचे नी हमहूं देख के ई मतलबी समाज
भगवान ए रचाव से अब काम ना चली

महंगाई   द्वेष  भूख   रोजगार  गरीबी 
जनता प एतना घाव से अब काम ना चली

बोली में अउर कुछ रहे करनी में अउर कुछ। 
बाबू जी ए सुभाव से अब काम ना चली
राजीव कुमार

हर तरफ शोर है नफ़रत है तबाही है दोस्त

हर तरफ शोर है नफ़रत है तबाही है दोस्त  
अब कहाँ इश्क़ ज़माने में बचा ही है दोस्त।

तेरे बारे में नहीं बोल रहा हूँ फिर भी 
मेरी हालत तेरे ज़ुल्मों की गवाही है दोस्त

कौन से सच की तरफ भाग रहा हूँ मैं भी
मेरे पीछे भी मेरा झूठ पङा ही है दोस्त

बात अच्छी है बुरी है नहीं मालूम मगर 
इश्क़ हर शख़्स को इक बार हुआ ही है दोस्त

इन महब्बत के सताये हुए लोगों के लिये 
दर्द  ये दर्द  नहीं है ये दवा ही है दोस्त

कैसे पायेंगे तरक़्क़ी का वो अमृत हम लोग
दिल में जब जह्र अदावत का भरा ही है दोस्त

बात इतनी है कि ईमान परस्तों के लिये।
आज का दौर भी इक सख़्त सजा ही है दोस्त

जिन्दगी एक सफर है तो मुझे लगता है 
मौत मंजिल नहीं दर अस्ल ये राही है दोस्त

जिसमें मजलूम की आवाज नहीं है शामिल
शेर वो शेर नहीं सिर्फ सियाही  है दोस्त 

राजीव कुमार

सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे ।

ग़ज़ल सीने पे जख्म आंख में दरिया दिखाई दे । आशिक वही जो दर्द में डूबा दिखाई दे जिसको यकीं नहीं है महब्बत में उसे भी मोहन के साथ ख़्वा...